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विश्व पुस्तक दिवस : वक्त के साथ मुट्ठी में समा गईं हजारों किताबें, इंडिया पढ़ रहा डिजिटल बुक्स

Tue, 23 Apr 2019 05:39 PM IST
Sayali Maurya पूजा सिंह,अमर उजाला,वाराणसी
पूजा सिंह,अमर उजाला,वाराणसी Published by: Sayali Maurya Updated Tue, 23 Apr 2019 05:39 PM IST
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International book day : India became digital about books

डिजिटल इंडिया के दौर में किताबें भी डिजिटल हो गई हैं। एक ओर जहां इंटरनेट के बढ़ते प्रयोग से किताबों को ऑनलाइन पढ़ने वालों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है, वहीं छपी किताबों की खुशबू के कद्रदानों की भी कमी नहीं है। ऑनलाइन मार्केटिंग ने किताबों की पहुंच को अब बेहद आम कर दिया है। पहले किताबों के प्रेमियों को पुस्तक मेला या चंद बड़ी दुकानों तक पुस्तकों के आने का इंतजार करना पड़ता था, लेकिन ई-कॉमर्स साइटों ने अब पाठकों तक किताबों की पहुंच को बेहद आसान कर दिया है। जिससे छोटे शहरों में भी पाठक और साहित्य प्रेमी किताबें ऑनलाइन खरीदने लगे हैं। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...

International book day : India became digital about books

मोबाइल पर भी किताबों को पढ़ने के लिए बाजार में तमाम एप्लीकेशन उपलब्ध हैं। गूगल ई-बुक स्टोर, अमेजॉन का किंडल सहित एंड्रायड और आईओएस पर भी किताबों को पढ़ने के लिए कई एप्स मौजूद हैं। ऐसा नहीं है कि किताबों की उपलब्धता से इन डिजिटल प्लेटफार्म पर बहुत असर पड़ा है। दोनों ही प्लेटफार्म, यानी ऑनलाइन और ऑफलाइन किताबों के कद्रदानों की कमी नहीं है। इसी संबंध में किताबों का महत्व बता रहे हैं कुछ साहित्यकार। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...

International book day : India became digital about books
डॉ. अमित शुक्ला - फोटो : अमर उजाला

आर्य महिला पीजी कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अमित शुक्ला की मानें तो नई किताब खुशबू की तरह है। उसे पढ़ने का सुख अलहदा ही होता है। हालांकि वह डिजिटल किताबों का स्वागत करते है, क्योंकि बदलते दौर में कई बार कुछ किताबें मार्केट में उपलब्ध नहीं हो पाती।

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झुमूर सेनगुप्ता - फोटो : अमर उजाला

बंगला साहित्य में असिस्टेंट प्रोफेसर झुमूर सेनगुप्ता कहतीं हैं कि पढ़ना केवल पढ़ना नहीं है, छपी किताब से जो आत्मीय रिश्ता पाठक का बनता है, वह डिजिटल बुक से नहीं बन सकता। किताबें मनुष्य की बहुत अच्छी साथी होती हैं। साहित्य की छात्रा प्रेरणा बतातीं हैं कि किताबें हमारे सबसे सच्ची साथी होती हैं। पुस्तकों से जो पाठ हम पढ़ते हैं वह जीवन भर हमारे साथ रहता है।

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ऐसे हुई पुस्तक दिवस की शुरुआत :
यूनेस्को द्वारा विश्व पुस्तक तथा स्वामित्व दिवस का औपचारिक शुभारंभ 23 अप्रैल 1995 को हुआ था। हालांकि इसकी नींव 1923 में स्पेन में पुस्तक विक्रेताओं द्वारा प्रसिद्ध लेखक मीगुयेल डी सरवेन्टीस को सम्मानित करने के लिए आयोजन के समय ही रख दी गई थी।

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