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जर्जर हो रहे सरकारी भवन: 11 साल में 44.5 लाख के शवदाह गृह बेकार, दो में नहीं हुआ एक भी अंतिम संस्कार; परेशानी

Thu, 24 Sep 2026 05:56 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, चंदाैली।
अमर उजाला नेटवर्क, चंदाैली। Published by: Aman Vishwakarma Updated Thu, 24 Sep 2026 05:56 AM IST
सार

जिले में 11 साल पहले 44.5 लाख रुपये से बने तीन शवदाह गृह अब बदहाल हैं। दो में आज तक एक भी अंतिम संस्कार नहीं हुआ। एक तक पहुंचने का रास्ता नहीं है, जबकि दूसरा सामान से घिरा है। तीसरे में रोज छह से 10 शवदाह के बावजूद चेंबर बेकार पड़ा है। ग्रामीण गंगा किनारे खुले में रोज 15-20 शवों का अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं।

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Government buildings falling into disrepair Crematoriums worth 44 lakh rendered useless over 11 years
गंगा किनारे खुले में शवों का अंतिम संस्कार हो रहा। - फोटो : संवाद

ग्रामीणों को अंतिम संस्कार की सुविधा देने और गंगा को प्रदूषण से बचाने के उद्देश्य से करीब 11 साल पहले जिले में तीन शवदाह गृह और अंत्येष्टि स्थलों का निर्माण कराया गया। इन पर सरकारी खजाने से 44.50 लाख रुपये खर्च हुए, लेकिन योजना का उद्देश्य अब तक पूरा नहीं हो सका। 





धानापुर क्षेत्र के नरौली और पंचगंगापुर-मेढ़वा में करीब 14-14 लाख रुपये की लागत से बने दो अंत्येष्टि स्थलों पर निर्माण के बाद से अब तक एक भी शवदाह नहीं हुआ। वहीं 16.50 लाख रुपये से विकसित बलुआ श्मशान घाट पर रोजाना छह से 10 शवदाह होने के बावजूद लोग शवदाह चेंबर के बजाय गंगा किनारे खुले में अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं।

सबसे गंभीर स्थिति नरौली के अंत्येष्टि स्थल की है। 11 वर्ष बीतने के बाद भी पहुंच मार्ग की समस्या दूर नहीं हुई। नतीजा यह है कि भवन और परिसर खड़ा होने के बावजूद ग्रामीण इसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। आसपास झाड़ियां उगी हैं और स्थल उपयोग के इंतजार में पड़ा है।

पंचगंगापुर और मेढ़वा स्थित करीब 14 लाख रुपये के अंत्येष्टि स्थल की कहानी भी इससे अलग नहीं है। जिस परिसर को अंतिम संस्कार के लिए सुरक्षित और व्यवस्थित स्थान के रूप में विकसित किया गया था, वहां प्लाटून पुल से संबंधित लकड़ी, रस्सियां और अन्य सामान रखा है। इससे परिसर का बड़ा हिस्सा घिर गया है। सामान के आसपास झाड़ियां उगी हैं और साफ-सफाई की स्थिति भी खराब है।

Government buildings falling into disrepair Crematoriums worth 44 lakh rendered useless over 11 years
यहां पहुंचने को रास्ता नहीं। - फोटो : संवाद

केस 1- 14 लाख का अंत्येष्टि स्थल, रास्ता नहीं तो 11 साल में एक भी शवदाह नहीं
धानापुर। नरौली घाट के पश्चिम दिशा में टापू पर वर्ष 2015-16 में करीब 14 लाख रुपये की लागत से अंत्येष्टि स्थल का निर्माण कराया गया था। निर्माण के समय से ही यहां पहुंचने के लिए समुचित रास्ता नहीं था। इसके बावजूद भवन का निर्माण करा दिया गया। अब करीब 11 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार यहां आज तक एक भी शवदाह नहीं हुआ है। अंतिम संस्कार के लिए ग्रामीणों को गंगा तट पर ही जाना पड़ता है। मौके पर भवन झाड़ियों से घिरा दिखाई देता है। 

ग्रामीणों का कहना है कि समय-समय पर साफ-सफाई और रंग-रोगन तो कराया जाता है, लेकिन जिस रास्ते के अभाव में अंत्येष्टि स्थल उपयोग में नहीं आ पा रहा है, उस मूल समस्या का समाधान नहीं किया गया। ग्रामीण लक्ष्मण मौर्य, रमेश द्विवेदी, गौरीशंकर और शिवकुमार दुबे ने कहा कि किसी योजना को स्वीकृति देने से पहले उसकी उपयोगिता और पहुंच मार्ग की जांच होनी चाहिए थी।

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सड़ रहीं हैं लकड़ियां। - फोटो : संवाद

केस 2- 14 लाख का शवदाह गृह, परिसर में पुल का सामान; आज तक नहीं हुआ इस्तेमाल
धानापुर। पंचगंगापुर व मेढ़वा स्थित अंत्येष्टि स्थल पर भी सरकारी धन खर्च होने के बाद सुविधा ग्रामीणों के काम नहीं आ रही है। करीब 14 लाख रुपये की लागत से बने शवदाह गृह के निर्माण के बाद से अब तक यहां एक भी शवदाह नहीं होने का दावा ग्रामीणों ने किया। परिसर में प्लाटून पुल से संबंधित लकड़ी, रस्सियां और अन्य सामान रखे होने से काफी जगह घिरी हुई है। सामान के आसपास झाड़ियां उग आई हैं और साफ-सफाई का भी अभाव है। 

ग्रामीणों के अनुसार, अंत्येष्टि स्थल के पास ही पुलिस चौकी भी है, लेकिन इसके बावजूद परिसर की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। लोगों का सवाल है कि जब शवदाह गृह का उपयोग ही नहीं हो रहा तो लाखों रुपये खर्च करने का उद्देश्य कैसे पूरा होगा। ग्रामीणों ने परिसर से सामान हटाकर सफाई कराने और शवदाह गृह को उपयोग में लाने की मांग की है।

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Government buildings falling into disrepair Crematoriums worth 44 lakh rendered useless over 11 years
रखरखाव के अभाव में जर्जर हो रहे सरकारी भवन। - फोटो : संवाद

केस 3- बलुआ में रोज छह से 10 शवदाह, फिर भी चेंबर बेकार
चहनिया। बलुआ स्थित श्मशान घाट पर रोजाना करीब छह से 10 शवदाह होते हैं। इसके बावजूद यहां बनाए गए शवदाह चेंबर का उपयोग नहीं हो रहा और लोग गंगा किनारे खुले में अंतिम संस्कार करते हैं। वर्ष 2015-16 में करीब 16.50 लाख रुपये खर्च कर घाट को विकसित किया गया था। वर्तमान में श्मशान घाट के शेड टूटे-फूटे हैं और चबूतरे क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। परिसर में जगह-जगह गंदगी दिखाई देती है। 

शौचालय की हालत सबसे खराब है। वह जर्जर और बदबूदार है, ताला भी टूटा हुआ है और पानी की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में अंतिम संस्कार में आने वाली महिलाओं, बुजुर्गों और अन्य लोगों को परेशानी होती है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायत के बावजूद मरम्मत और सफाई की ओर ध्यान नहीं दिया गया। लोगों ने श्मशान घाट की मरम्मत, शौचालय के पुनर्निर्माण और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है।

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जर्जर हालत से परेशान हैं ग्रामीण। - फोटो : संवाद

हर साल रंग-रोगन, फिर भी नहीं सुधरी मूल समस्या
नरौली के अंत्येष्टि स्थल को लेकर ग्रामीणों का कहना है कि कई बार साफ-सफाई और रंग-रोगन कराया जाता है, लेकिन पहुंच मार्ग की समस्या जस की तस है। ग्रामीणों का सवाल है कि जिस स्थल तक शव लेकर पहुंचना ही संभव नहीं है, वहां भवन बनाकर और उसके रखरखाव पर खर्च करने से योजना का उद्देश्य कैसे पूरा होगा। ग्रामीणों ने पूरे मामले की जांच कराने और अंत्येष्टि स्थल तक स्थायी रास्ते की व्यवस्था कराने की मांग की है।

गंगा किनारे खुले में अंतिम संस्कार की मजबूरी
शवदाह गृहों के निर्माण का एक प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम संस्कार के लिए व्यवस्थित स्थान उपलब्ध कराने के साथ गंगा को प्रदूषण से बचाना भी था। लेकिन बलुआ में शवदाह चेंबर के इस्तेमाल में नहीं आने और नरौली में पहुंच मार्ग न होने के कारण लोग खुले गंगा घाट पर ही अंतिम संस्कार करते हैं। इससे सरकारी योजना की उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि बने हुए शवदाह गृहों को उपयोग लायक बनाया जाए तो लोगों को सुविधा मिलने के साथ नदी किनारे खुले में होने वाले अंतिम संस्कार को भी कम किया जा सकता है।

ग्रामीण बोले, जांच हो और जिम्मेदारी तय की जाए
14 लाख से बने अंत्येष्टि स्थल का वर्षों से ग्रामीणों को लाभ नहीं मिल रहा है। निर्माण के समय ही रास्ते की व्यवस्था कर दी जाती तो आज लोग इसका इस्तेमाल कर रहे होते। उन्होंने मामले की जांच कराने और स्थायी पहुंच मार्ग बनाने की मांग की। - हरिकेश कुमार गौतम, नरौली

लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी ग्रामीणों को सुविधा नहीं मिल सकी। जब स्थल तक पहुंचने का रास्ता ही नहीं था तो निर्माण से पहले उसकी उपयोगिता पर विचार किया जाना चाहिए था। उन्होंने जांच कर जिम्मेदारी तय करने की मांग की। - विपिन रस्तोगी, निवासी, धानापुर

14 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद 11 साल में एक भी शवदाह नहीं हुआ। उन्होंने सवाल उठाया कि रास्ता नहीं होने के बावजूद निर्माण कैसे करा दिया गया। बड़े घोटाला का अंदेशा है। - अनूप कुमार, धानापुर

अंत्येष्टि स्थल सरकारी योजना की हकीकत बयां कर रहा है। लाखों रुपये खर्च हुए, लेकिन ग्रामीणों के लिए आज भी रास्ता नहीं है। जिम्मेदार अधिकारियों को जवाब देना चाहिए कि बिना पहुंच मार्ग के निर्माण की अनुमति आखिर कैसे मिली। मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। - अमित सिंह, नरौली

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