तीनों लोक से न्यारी काशी की धरा पर आज देव दीपावली की शाम इंद्रधनुषी छटा निखरेगी। गंगा का अर्धचंद्राकार किनारा दैवीय आभा से दमक उठेगा। सुरसरि के घाटों पर ओर से छोर तक दीपों का तारामंडल इठलाएगा तो पूनम का चांद भी शरमा जाएगा। गंगा घाटों पर दीपों का अद्भुत जगमग प्रकाश 'देवलोक' जैसे वातावरण की ही सृष्टि करता है। आज शाम होने वाले इस महा आयोजन के लिए काशी में रेला उमड़ा हुआ है। देव दीपावली पर गंगा के घाटों की न सिर्फ छटा अलौकिक होगी बल्कि अलग-अलग स्थानों पर विविध कार्यक्रम आकर्षण के केंद्र रहेंगे।
भव्य और दिव्य काशी की देव दीपावली इस बार नव्य स्वरूप में देवताओं के साथ ही काशी वासियों के लिए भी अनोखी होगी। इस बार काशी के घाट, कुंड और सरोवरों पर 21 लाख दीपों की रोशनी की आभा दीप मालिकाओं का स्वर्णिम संसार रचेगी। बहुत से लोग नहीं जानते हैं कि देव दीपावली काशी में ही क्यों मनाई जाती है तो आइये इस बात से पर्दा उठाते हैं।
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देव दीपावली पर काशी विश्वनाथ धाम में सजावट
- फोटो : अमर उजाला
पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के कुछ दिन पहले देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु 4 महीने की निद्रा के बाद जागते हैं। जिसकी खुशी में सभी देवता स्वर्ग से उतरकर बनारस के घाटों पर दीपों का उत्सव मनाते हैं। इसके अलावा मान्यता यह भी है कि भगवान शंकर ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन त्रिपुर नाम के असुर का वध करके काशी को मुक्त कराया था। जिसके बाद देवताओं ने इसी कार्तिक पूर्णिमा के दिन अपने सेनापति कार्तिकेय के साथ भगवान शंकर की महाआरती की और इस पावन नगरी को दीप मालाओं से सजाया था।
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देव दीपावली पर सजावट
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देव दीपावली को लेकर संतों विद्वानों की मान्यता के अनुसार एक तो यह कि काशी के प्रथम शासक दिवोदास ने अपने राज्य में देवी देवताओं का प्रवेश बंद कर दिया था। छिपे रूप में देवगण कार्तिक मास पंचगंगा घाट पर पवित्र गंगा में स्नान को आते रहे। बाद में देवताओं ने राजा को प्रभावित कर यह प्रतिबंध हटावा लिया। इस विजय को हर्षोल्लास से मनाने के लिए सभी देवी देवता बनारस में दीप मालाओं से सुसज्जित विजय दिवस मनाने और भगवान शिव की महाआरती के लिए कार्तिक पूर्णिमा के दिन पधारे थे। तभी से देव दीपावली मनाई जाने लगी।
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देव दीपावली पर सजा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर
- फोटो : अमर उजाला
वैसे तो देव दीपावली का उल्लेख निर्णय सिंधु और स्मृति कौस्तुभी में भी है। काशी में इसकी शुरुआत पुरातन काल से मानी जाती है। हालांकि देव दीपावली वर्ष 1986 में पूर्व काशी नरेश स्व डॉ. विभूति नारायण सिंह पंचगंगा पर हजारा दीप जलाकर कराई थी। काशी की संस्कृति में चार लक्खा मेले में रथयात्रा मेला, नाटी इमली का भरत मिलाप, चेतगंज की नक्कटैया और तुलसी घाट की नागनथैया के बाद अब कोटि मेले के रूप देव दीपावली को माना जाता रहा है।
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दरभंगा घाट पर सजावट
- फोटो : अमर उजाला
मान्यता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तो सूर्य की पहली किरण इसी पावन काशी नगरी की धरती पर पड़ी थी। परंपराओं और संस्कृतियों से रची-बसी काशी की देश दुनिया में पहचान बाबा विश्वनाथ, गंगा और उसके पावन घाटों से है। यहां के लोगों की सुबह हर-हर गंगे के साथ शुरू होती है तो शाम उसी मोक्षदायिनी गंगा के तट पर प्रतिदिन होने वाली आरती जय मां गंगे के साथ खत्म होती है।