मोर आजकल जंगल में ही नहीं नाचता। सिविल लाइन जैसे पॉश इलाके में भी अब रोज सड़कों पर झूमता नजर आ रहा है। बेगमपुल के ऊपर तोते उड़ रहे हैं तो चिड़ियों की गुनगुनाहट शहर के हर इलाके में सुनाई दे रही है। कानों में रस घोलती कोयल की कूक हो या फिर बालकनी और घर के आंगन में आकर गुनगनाती नन्हीं चिड़िया का कलरव। ये नजारा आजकल शहर में हर तरफ नजर आ रहा है।
विश्व धरा दिवस: घरों में कैद हुआ इंसान, गुनगुना रही फिजा, शहर में नाचा मोर, बालकनी में कूकी कोयल
पिछले एक महीने से मेरठ ही नहीं, हर जगह का माहौल बदला-बदला है। एक तरफ जहां कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन ने सबको घरों में कैद होने पर मजबूर कर दिया है।
जिस वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण को कोई सरकार खत्म नहीं कर पाई। सबकुछ बंद होने के कारण वह खुद-ब-खुद बहुत कम रह गया है।
एकतरफ जहां जगह-जगह सन्नाटा पसरा है वहीं, इस समय पंछियों का कलरव बहुत बढ़ गया है। कोई जगह ऐसी नहीं जहां पर पंछियों की आवाज मन को न मोह लेती है।
ऐसा नहीं है कि ये पंछी अचानक कहीं से आ गए हैं। ऐसा भी नहीं है कि एक महीने में इनकी संख्या बढ गई है। फर्क बस इतना है कि उनकी जिंदगी में इंसानी दखल कम हुआ तो वे खुश होकर गुनगुना रहे हैं।
घरों की मुंडेर पर कई तरह की नन्ही चिड़िया फुदक रहीं हैं। वन्य वन्य जीव सलाहकार जीएस खुशरिया बताते हैं कि इंसान का कोलाहल कम होने से इन पंछियों की आवाज के साथ ही मूवमेंट भी बढ़ गया है। वे पहले भी यहीं रहते थे लेकिन इंसान के कोलाहल के कारण वे चुप रहते हैं। डरे रहते हैं।
ऐसे ही पंछियों की आवाज कहां सुनाई देगी। जीएस खुशारिया कहते हैं कि हमको इससे सबक लेना चाहिए। पृथ्वी जितनी हमारी है उतनी ही इन जीव-जंतुओं की है।
हम किस तरह से पर्यावरण को संरक्षित रख सकते हैं। अधिक से अधिक पौधे लगाएं। प्रदूषण फैलाने से रोकें। छोटे पंछियों के लिए बिल्डिंग सबसे घातक हो गई हैं। ऐसे में लोगों को चाहिए कि छोटे पंछियों के लिए छत और बालकनी में खाने के लिए कंगनी, किनकी चावल और बाजरा डालें।