मेरठ के रैन बसेरों में बिस्तर नहीं मिल रहे हैं, जिसका परिणाम यह है कि शहर की अधिकतर सड़कों पर गरीब कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रात गुजार रहे हैं। हल्के कपड़े पहने ये गरीब लोग कब भगवान को प्यारे हो जाएं कुछ नहीं पता। इनको लेकर जिला प्रशासन भी कतई गंभीर नहीं है।
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खुले आसमान के नीचे बीत रही गरीबों की रातें
- फोटो : अमर उजाला
महानगर में 14 स्थानों पर रैन बसेरे हैं। जिनके संचालन की जिम्मेदारी नगर निगम की है। न्यायालय और शासन के निर्देशानुसार सभी रैन बसेरों में गरीबों को ठहरने के लिए तख्त, बिस्तर, लाइट, पानी, शौचालय आदि की सुविधा होनी चाहिए।
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बता दें कि पिछले साल नगर निगम के अधिकारियों ने अपने खर्च से सभी रैन बसेरों को गोद लेकर बिस्तर आदि सभी सामान की व्यवस्था करायी थी। ठीक रखरखाव न होने के कारण कुछ सामान चोरी हो गया तो कुछ खराब हो गया। लेकिन नगर निगम प्रशासन ने इस बार न तो अभी तक रैन बसेरों में पर्याप्त बिस्तरों का इंतजाम किया गया है और न ही लाइट, साफ सफाई का ध्यान रखा गया है। शौचालयों की हालत भी बद से बदतर है।
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शहर में बच्चा पार्क, टाउन हॉल, कासमपुर, पल्लवपुरम, भोला रोड, परतापुर, जिला अस्पताल, आई ब्लॉक शास्त्रीनगर, सूरजकुंड आदि स्थानों पर रैन बसेरे हैं। खासकर रैन बसेरों के आसपास ही लोग सड़क किनारे दुकानों के बाहर चादर तानकर सोते मिल रहे हैं। तापमान प्रतिदिन गिर रहा है। ठंड से लोग दिन में भी सिकुड़ते फिर रहे हैं। एक गरीब है कि अपनी रात भी खुले आसमान के नीचे गुजारने को मजबूर है।
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अलाव की भी व्यवस्था नहीं
नगर निगम की तरफ से शहर के प्रमुख चौराहे और रैन बसेरों में अलाव जलाया तो जा रहा है, लेकिन लकड़ी इतनी कम है कि वह पूरी रात जल ही नहीं पाती है। जिसके कारण लोगों को अलावा की गर्मी भी पूरी तरह नहीं मिल रही है। शहर के घंटाघर, मेट्रो प्लाजा, सोहराब गेट बस अडडा, शाहपीर गेट रिक्शा स्टेंड, इंदिरा चौक, भैसाली बस अड्डा सहित सभी रैन बसेरों पर अलावा डाला जा रहा है।