दनकौर: एकलव्य की साधना व द्रोण की दक्षिणा का ठौर, जहां है शिष्य द्वारा बनाई गुरु की दुर्लभ मूरत
मंदिर कमेटी के महासचिव लक्ष्मीनारायण बताते हैं कि एकलव्य द्रोणाचार्य की इस मूर्ति के सामने धनुर्विद्या सीखते थे। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से यह मूरत बनाई थी। दनकौर में ही द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उनके दाहिने हाथ का अंगूठा गुरु दक्षिणा में मांगा था। मंदिर की देखरेख कमेटी करती है। विश्व में द्रोणाचार्य का यह एकमात्र मंदिर है। दूर-दूर से लोग यहां आते हैं।
द्रोण कुंड
द्रोण कुंड के बारे में प्रचलित है कि इसमें कितना भी पानी भर दो, तीसरे दिन यह खाली हो जाता है। किवदंती है कि पहले यह तालाब भरा रहता था। दुर्वासा ऋषि यहां आए। उन्होंने कुंड में स्नान किया। कुंड में उनका कमंडल बह गया। उन्होंने शाप दिया कि यह खाली रहेगा। तब से कुंड में पानी नहीं रहता।