पांडवों का एक पड़ाव सरधना का वनखंडी भी है जिसका नाम युगों के प्रभाव में विस्मृत हो गया। रह गया पांडवों द्वारा स्थापित शिवलिंग। लाक्षागृह जाते समय पांडव इस स्थान पर ठहरे। यहीं माता कुंती को स्वप्न आया कि जहां जा रहे हैं, वहां दुर्योधन ने पांडवों को मारने की योजना बनाई है।
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सुरक्षा के उपाय में यहां शिवलिंग की स्थापना बताई। तब कुंती पुत्रों ने यहां महादेव की पिंडी स्थापित की। जो वर्तमान में बहुत छोटे रूप में मौजूद है। इसे पांडव कालीन महादेव मंदिर कहा जाता है। यह स्थल धार्मिक पर्यटन का भी एक पड़ाव बन सकता है लेकिन इस दिशा में प्रयास नहीं हुए।
मेरठ से करीब 22 किमी दूर सरधना में स्थित पांडवकालीन महादेव मंदिर का भव्य प्रवेश द्वार है। अंदर प्राचीन शिवलिंग है। वह बहुत छोटे रूप में बचा है। मंदिर में देवी मां की मूर्ति की नव स्थापना है। क्षेत्र में मंदिर की काफी मान्यता है।
मंदिर कमेटी के उपमंत्री सतीश वर्मा ने बताया, पहले इस क्षेत्र का नाम वनखंडी था। इस मंदिर की विशेषता है कि कभी-कभी यहां के सारे घंटे स्वतः बजते हैं। यहां सुबह-शाम पक्षियों को दाना डाला जाता है। अन्य जगहों के लोग यहां नहीं आ पाते। पुजारी शंकर लाल शर्मा के अनुसार कुंती के आदेश पर पांडवों ने इस पिंडी की स्थापना की थी।
इतिहास के गवाक्ष से
केके शर्मा की पुस्तक ‘मेरठ जनपद के पर्यटक स्थल’ में लिखा है, सरधना में कैथोलिक कब्रिस्तान के निकट प्राचीन महादेव मंदिर स्थित है। प्राचीन काल में इसे वनखंडी के नाम से जाना जाता था। अनुश्रुतियों के अनुसार बरनावा स्थित लाक्षागृह जाते समय पांडव इस स्थान पर ठहरे थे।
रात्रि विश्राम के समय माता कुंती को यह स्वप्न आया था कि लाक्षागृह के जिस महल में पांडव जा रहे हैं, वहां पर दुर्योधन द्वारा उन्हें मारने की योजना बनाई गई है। इसके साथ ही स्वप्न में सुरक्षा के उपाय भी सुझाये गए थे। जिस स्थान पर पांडव ठहरे थे, वहां उनके द्वारा शिवलिंग की स्थापना की जाए।
फुगाना के पास स्थित खरड़ गांव से भी महाभारत कालीन जनश्रुति जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि दुर्योधन युद्ध क्षेत्र से आकर यहां के तालाब में छिपा था। गांव के बाहर प्राचीन वनखंडी में यह तालाब है जो पूर्ण रूप से उपेक्षित है। इसकी बुर्जियां भी जीर्ण-शीर्ण हो गई हैं। तालाब के किनारे प्राचीन शिवालय है। थोड़ा आगे अर्जुन के पुत्र बभ्रुवाहन द्वारा स्थापित शीतला माता का मंदिर है। 2009 में प्राचीन मूर्ति खंडित होने पर हटा दी गई। उसके स्थान पर नई मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई।