जुल्मों से भरी जिंदगी में बंधक बनकर रहती हैं, सिखाया है चुप रहना इसलिए होंठ सिये रहती हैं। समाज और अपनों के सितम बर्दाश्त करना ही उन्हें अच्छा बनाता है। ससुराल में चाहे कितनी भी तकलीफ क्यों न मिले, उससे बाहर कदम रखना गुनाह है।
न जुल्मों की इंतेहा, न सहने की..., जिसने अस्मत लूटी उसी से करा दिया निकाह, फिर जो हुआ, भयावह था
हिजाब के पीछे छिपी शबनम (बदला नाम) के मासूम चेहरे पर उसकी दर्दनाक दास्तां लिखी है। महज 19 साल की उम्र में उसने कितनी दरिंदगी झेली है। अस्मत लूटने वाले से उसका निकाह करा दिया गया। फिर जो हुआ, भयावह था।
दूसरी तरफ आयशा को अपनों ने ही तबाह कर दिया। प्यार और वफा के बदले पति ने उसे न सिर्फ तीन तलाक दिया बल्कि उसके बच्चे भी छीन लिए। उनमें से एक 11 दिन का था। आयशा ही नहीं, उसका आंचल भी रोता है। तीन तलाक के खिलाफ कानून बनने के बाद भी इस तरह के मामलों पर अंकुश नहीं लग पाया है।
शबनम बताती है, यह मुझसे बदला लेने के लिए किया गया था। ससुराल के लोग मुझसे मारपीट करते थे। देवर और श्वसुर कहते, अब तुझे बताएंगे, रेप कैसे होता है। 16 सितंबर की रात श्वसुर ने मेरी इज्जत लूटी। 17 की सुबह पति को पता चला तो उन्होंने मुझे तीन तलाक दे दिया। शाहीन मैम ने मेरा मुकद्दमा दर्ज कराया। पति जेल में है। श्वसुर को गिरफ्तार नहीं किया गया। अभी भी पंचायत चल रही है।
आयशा के साथ अपनों ने ही दगा किया। उनकी वजह से वह रास्ते पर आ गई। यहां भी पंचायत का घिनौना रूप ही देखने को मिला। उसका निकाह 2014 में हुआ था। आयशा की तीन साल की बेटी है। 2019 में वह गर्भवती थी। 26 जनवरी को पति ने उसे तीन तलाक दे दिया। उसने इसे नहीं माना और ससुराल में ही रही। आयशा ने बेटे को जन्म दिया।
11 दिन का बच्चा आईसीयू में था। तभी ससुराल, मायके वाले और पंचायत ने मिलकर उसकी तकदीर का फैसला कर दिया। घरवालों ने बहाने से समझौते के कागज पर आयशा के दस्तखत करा लिए। ससुराल वालों ने सारे जेवर और रकम उसके मायके वालों को दे दी। उसके दोनों बच्चे छीन लिए। आयशा ने पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस की कार्रवाई न होने पर वह थाने में ही धरने पर बैठी। शाहीन परवेज दोनों केस लड़ रही हैं। आयशा के मामले में उन्होंने उसके पिता और पंचायत के खिलाफ भी एफआईआर कराई है।
पंचायतों के खिलाफ भी हो कार्रवाई
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय संयोजिका शाहीन परवेज कहती हैं, पंचायत का फर्ज लड़कियों के घर बसाना है न कि तोड़ना। लड़कियों के मामले में उसका रुख बेहद नकारात्मक है। वह कभी महिलाओं के अधिकारों की बात नहीं करती।
पंचायतों के खिलाफ कार्रवाई की सख्त जरूरत है। तीन तलाक के मामले में जमानत इस शर्त पर होनी चाहिए कि पति अपनी पत्नी की जिम्मेदारी ले। उसे साथ लेकर जाए। इससे जो औरतें पति के साथ जाना चाहती हैं, उनके घर फिर से बस पाएंगे।