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खास खबर: पेटेंट तकनीक से कानपुर के हैलट में दी गई दुनिया की पहली स्टेम सेल थेरेपी, ये है डिवाइस की खासियत

Wed, 24 Nov 2021 12:47 PM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Wed, 24 Nov 2021 12:47 PM IST
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world's first stem cell therapy was given in hallet hospital kanpur with patented technology
हैलट के नेत्र रोग विभाग में स्टेम सेल थेरेपी देने वाले डॉक्टरों की टीम - फोटो : अमर उजाला
दुनिया में पहली बार विशेष पेटेंट डिवाइस से रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा मर्ज के नेत्ररोगी को स्टेम सेल थेरेपी दी गई है। मंगलवार को जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. परवेज खान ने स्टेम सेल थेरेपी के विशेषज्ञ डॉ. बीएस राजपूत के साथ थेरेपी दी।


रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा के रोगी को स्टेम सेल थेरेपी दिए जाने का यह देश का पहला केस है। विशेष तकनीक का इस्तेमाल होने के कारण यह दुनिया का पहला केस हो गया है। यह विशेष डिवाइस सुप्रा कोराइडिल नीडल नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. खान के नाम पेटेंट है।

हैलट में शुक्लागंज के रहने वाले 30 साल के नेत्ररोगी को स्टेम सेल थेरेपी दी गई। वह पांच साल की उम्र से इस बीमारी की गिरफ्त में था। इसके बाद उसकी आंख की रोशनी चली गई थी। जांचों के बाद उसे स्टेम सेल थेरेपी के लिए चुना गया।
world's first stem cell therapy was given in hallet hospital kanpur with patented technology
हैलट के नेत्र रोग विभाग में स्टेम सेल थेरेपी देने वाले डॉक्टरों की टीम - फोटो : अमर उजाला
मंगलवार को विभागाध्यक्ष डॉ. परवेज खान और मुंबई के स्टेम सेल थेरेपी विशेषज्ञ व जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. बीएस राजपूत ने रोगी को थेरेपी दी। उसकी आंख में रेटिना की ऊपरी सतह सुप्रा कोराइडल स्पेस में स्टेम सेल दी गईं। उम्मीद की जा रही है कि इससे रिकवरी तेज होगी।

रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा में स्टेम सेल थेरेपी का देश में पहली बार इस्तेमाल किया गया है। लेकिन, डॉ. खान की पेटेंट डिवाइस से यह दुनिया का पहला मामला है। - डॉ. संजय काला, मेडिकल कॉलेज प्राचार्य

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हैलट के नेत्र रोग विभाग में स्टेम सेल थेरेपी देने वाले डॉक्टरों की टीम - फोटो : अमर उजाला
डिवाइस में खास 
रेटिना की सतह के ऊपर आठ सौ माइक्रॉन की झिल्ली भेदकर पहुंचाई जाती है दवा आंख की रेटिना की सतह के ऊपर आठ सौ माइक्रॉन की झिल्ली होती है। अभी तक इसे भेदकर दवा डालने की कोई डिवाइस नहीं थी। डॉ. परवेज ने विशेष प्रकार की नीडल खोजी।
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हैलट के नेत्र रोग विभाग में स्टेम सेल थेरेपी देने वाले डॉक्टरों की टीम - फोटो : अमर उजाला
इसकी मदद से सुप्रा कोराइडल लेयर में दवा पहुंचाई जा सकती है। डॉ. खान ने बताया कि झिल्ली इतनी बारीक है कि जरा सा अधिक भेदने पर दवा उस पार आंख के हिस्से में चली जाएगी। इस झिल्ली में दवा डालने से वह रेटिना तक पहुंच जाती है। इसके साइड इफेक्ट्स भी नहीं होते।
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हैलट के नेत्र रोग विभाग में स्टेम सेल थेरेपी देने वाले डॉक्टरों की टीम - फोटो : अमर उजाला
क्या है रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा?
इस बीमारी में रेटिना की कोशिकाएं अपने आप मरने लगती हैं। इससे रोगी को पहले रात में और फिर दिन में दिखना बंद हो जाता है। इसके बाद आंख की रोशनी चली जाती है।
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