दुष्कर्म के आरोप में जेल जाने के बाद भी उसका रसूख और दबदबा पूरे जिले में कम नहीं हुआ। कांग्रेस पार्टी से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले साधारण युवक ने खुद को उन्नाव में एक नहीं चार बार बाहुबली विधायक के रूप में स्थापित किया। रूतबा ऐसा कि जिस पार्टी से भी चुनाव लड़े जीत पक्की। हम आपको उन्नाव दुष्कर्म कांड के मुख्य आरोपी भाजपा से विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के 25 सालों के सफर के बारे में बताने जा रहे हैं।
कुलदीप सेंगर के कांग्रेसी से भाजपा के बाहुबली विधायक बनने की कहानी, जेल जाने के बाद भी कायम रहा रसूख
कुलदीप सिंह सेंगर का राजनीतिक सफर ग्राम पंचायत की सियासत से शुरू हुआ था। ननिहाल (माखी गांव) में बसे कुलदीप की जन्मस्थली जिले की सबसे बड़ी ग्राम पंचायतों में शामिल है। एक बार गांव के प्रधान रहे कुलदीप ने युवा कांग्रेस से सक्रिय राजनीति में कदम रखा। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। सभी दलों में अच्छी पैठ के बूते वह लगातार चौथी बार विधायक हैं।
कुलदीप ने पच्चीस साल में खड़ा किया सियासी साम्राज्य
राजनीतिक रसूख ही है कि दुष्कर्म की रिपोर्ट दर्ज होने, जेल जाने और सीबीआई की जांच जारी होने के बाद भी उनका क्षेत्र में दबदबा कायम रहा। यही नहीं इस मुद्दे पर गैर भाजपाई दलों के घेरने पर अब कुलदीप के भाजपा से निलंबन की कार्रवाई हुई है। विधायक का उनका दर्जा बरकरार है। कुलदीप सेंगर के पिता मुलायम सिंह मूल रूप से फतेहपुर जिले के निवासी थे।
जब जिस दल में चाहा सदस्यता ली और लड़ा चुनाव
नाना वीरेंद्र सिंह का कोई बेटा नहीं था। केवल दो बेटियां चुन्नी देवी और सरोजनी देवी ही हैं। चुन्नी देवी शादी के बाद से अपने परिवार समेत पिता के साथ रहने लगीं। उन्हीं के चार बेटों में कुलदीप सबसे बड़े, मनोज दूसरे नंबर के और अतुल तीसरे नंबर के हैं। कुलदीप के सबसे छोटे भाई विपुल सिंह की करीब दस साल पहले बीमारी से मौत हो गई थी। कुलदीप समेत सभी भाइयों का जन्म ननिहाल के गांव में हुआ।
कुलदीप सिंह 1996 में पहली बार ग्राम प्रधान चुने गए। इसके बाद पांच साल के दो कार्यकाल में माता चुन्नी देवी प्रधान रहीं। मौजूदा समय में छोटे भाई अतुल सिंह की पत्नी अर्चना सिंह ग्राम प्रधान हैं। वर्ष 2002 में कुलदीप ने बसपा से उन्नाव सदर सीट से पहली बार सक्रिय राजनीति में कदम रखा और विधायक चुने गए। 2007 में उन्होंने सपा का दामन थामा और बांगरमऊ से विधायक बने।