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सावन में कहीं डूबी सालों पुरानी प्रथा, जानिए क्या है वजह
प्रतीक मिश्रा, कानपुर
Updated Thu, 09 Aug 2018 05:24 PM IST
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सावन में झूलों की बिक्री पर कानपुर के दुकानदारों और शिव भक्तों ने व्यक्त किए अपने विचार
सावन के महीने में जहां एक ओर भक्त भगवान शिव की भक्ति में डूबे हुए हैं तो दूसरी ओर सालों से चली आ रही झूले लगाने की प्रथा भी समय के साथ डूबती जा रही है। सावन में झूलों की बिक्री पर कानपुर के दुकानदारों और शिव भक्तों ने व्यक्त किए अपने विचार।
झूला विक्रेता संत प्रसाद कुशवाहा
अशोक नगर के झूला विक्रेता संत प्रसाद कुशवाहा बताते हैं कि बदलते वक्त के साथ झूले की बिक्री भी कम हो गई है। पहले जहां पूरे महीने में 150-200 झूलों की बिक्री बड़े आराम से हो जाती थी वहीं अब 15-20 झूलों की बिक्री होना भी भारी पड़ जाता है। सिंगल साइज झूले तो फिर भी बिक जाते हैं लेकिन डबल साइज झूलों को अब कोई पूछता भी नहीं है। सभी झूले बेत की लकड़ी का इस्तेमाल कर बनाए जाते हैं और उनकी रेट की शुरूआत 1500 रुपए से होती है। संत ने यह भी बताया की पहले जहां अशोक नगर इलाके में 7-8 दुकाने हुआ करती थी वहीं अब पूरे इलाके में लकड़ी के झूलों की एक मात्र उनकी ही दुकान रह गई है।
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राज अायरन हाउस के मालिक सुनील वर्मा
अशोक नगर स्थित राज अायरन हाउस के मालिक सुनील वर्मा ने बताया कि लोहे के बने झूले ज्यादातर वही लोग ले जाते हैं जिन्हें अपने घर की बालकनी या गार्डन में झूले लगवाने होते हैं। सीजनल बिक्री से धंधे पर बहुत असर पड़ता है। पहले के समय में सावन के दिनों में बिक्री बढ़ जाती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। लोहा महंगा पड़ने की वजह से लोग लकड़ी के झूले ही अपने घरों में लगने लगे हैं। जो लोग लोहे के झूले लगाते भी हैं वह अमूमन डबल साइज झूले ही खरीदते हैं। दामों की शुरूआत 6000 रुपए से होती है और बाकी उसके साइज पर निर्भर करता है।
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लोगों ने व्यक्त किए अपने विचार
कानपुर- फूलबाग निवासी अस्मिता ने बताया की बचपन से ही उनकी दादी सावन के महीने समय घर में लकड़ी का झूला लगवाती थीं और आज भी उनके यहां ऐसा किया जा रहा है। पहले उनके आस-पास के घरों में भी झूले लगाए जाते थे लेकिन बदलते समय के साथ लोगों ने यह बंद कर दिया।
शास्त्री नगर के रहने वाले आर्यन नें बताया की पहले उनके घर में सावन के महीने में झूले लगाए जाते थे। लेकिन अब यह प्रथा पूरी तरह से बंद हो चुकी है। उनके आस-पास के कई घरों में भी अब झूले लगाना कम हो गया है।
गांधी नगर की विधि बताती हैं कि सवन के दिनों में वह पापा से बोलकर घर में झूला लगवाती हैं। स्कूल के दोस्तों के यहां ऐसा देखकर उन्होंने भी घर में झूला लगवाना शुरू किया।
कल्याणपुर निवासी गौरव श्रीवास्तव नें इस पर कहा की पहले उनके यहां सावन मास में झूला लगाया जाता था लेकिन धीरे-धीरे यह प्रथा बंद हो गई।
शास्त्री नगर के रहने वाले आर्यन नें बताया की पहले उनके घर में सावन के महीने में झूले लगाए जाते थे। लेकिन अब यह प्रथा पूरी तरह से बंद हो चुकी है। उनके आस-पास के कई घरों में भी अब झूले लगाना कम हो गया है।
गांधी नगर की विधि बताती हैं कि सवन के दिनों में वह पापा से बोलकर घर में झूला लगवाती हैं। स्कूल के दोस्तों के यहां ऐसा देखकर उन्होंने भी घर में झूला लगवाना शुरू किया।
कल्याणपुर निवासी गौरव श्रीवास्तव नें इस पर कहा की पहले उनके यहां सावन मास में झूला लगाया जाता था लेकिन धीरे-धीरे यह प्रथा बंद हो गई।