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18 की उम्र में सम्मान को ठेस पहुंची, 37 साल की उम्र में मिला न्याय, आईआईटी कानपुर हॉस्टल का मामला

Fri, 30 Nov 2018 01:14 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Updated Fri, 30 Nov 2018 01:14 PM IST
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Respect of honor at the age 37 IIt kanpur hostel case
डेमो पिक

सम्मान की लड़ाई लड़ रही एक युवती को 19 साल बाद सत्र न्यायालय से न्याय मिला है। युवती के साथ छींटाकशी करने और विरोध पर गालीगलौज, मारपीट व जान से मारने की धमकी देने के दोषियों को कोर्ट ने एक-एक साल कैद की सजा सुनाई है। साथ ही 11-11 हजार रुपये का जुर्माना भी किया है। आईआईटी कानपुर के हॉस्टल में रहने वाली एक युवती के पिता ने कोहना थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। 

 

Respect of honor at the age 37 IIt kanpur hostel case
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इसमें कहा था कि 3 जून 1999 की दोपहर युवती विष्णुपुरी कॉलोनी स्थित गोविंद स्वीट हाउस से सामान लेने गई थी। इस बीच, नगर महापालिका कॉलोनी कोहना निवासी सुरेश गुप्ता, राजन यादव और ज्ञान भदौरिया ने छींटाकशी की। विरोध पर गालीगलौज करते हुए मुंह पर मुक्का जड़ दिया। शिकायत पर जान से मारने की धमकी भी दी।

 

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मुकदमे के दौरान ज्ञान भदौरिया की मौत हो गई। आठ साल बाद 2007 में कोर्ट में सुरेश और राजन के खिलाफ आरोप तय हो सके। इसके बाद न्यायिक कार्यवाही में सात साल लग गए और 12 नवंबर 2014 को महानगर मजिस्ट्रेट प्रथम की कोर्ट का फैसला आया। कोर्ट ने दोनों आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया। 

 

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फैसले से आहत किशोरी ने अपने सम्मान की लड़ाई को जारी रखते हुए निचली अदालत के आदेश के खिलाफ सेशन कोर्ट में अपील दाखिल कर दी। मामले की सुनवाई एडीजे-12 ममता गुप्ता के यहां हुई। एडीजीसी आलोक अवस्थी ने बताया कि निचली कोर्ट के फैसले में कई खामियां थीं, जिन्हें सेशन कोर्ट में उजागर किया गया। सबूतों और गवाहों के बयानों के आधार पर सेशन कोर्ट ने निचली कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए दोनों दोषियों को सजा सुनाई। 18 की उम्र में इस घटना की शिकार युवती अब करीब 37 साल की है।

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कोर्ट की टिप्पणी
एडीजे-12 ममता गुप्ता ने आदेश में लिखा कि मामला 18 वर्षीय (मुकदमे के दौरान) युवती के साथ छींटाकशी करने और विरोध पर गालीगलौज, मारने से संबंधित है। यह ऐसा अपराध है, जो बालिकाओं और महिलाओं में असुरक्षा की भावना बढ़ाता है। उन्हें सरेराह अपमानित करता है और समाज में अपनी इच्छा के अनुसार जीवनयापन की राह में बाधा पहुंचाता है। बालिकाओं की प्रगति में अवरोधक है और समाज में अपने को स्थापित करने के उनके हौसलों को पस्त करने वाला है। इसलिए दोषियों को कठोर कारावास से दंडित किया जाना न्यायोचित है।
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