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भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की शहादत के बारे में शायद आपको ये बातें पता न होंगी

Sat, 24 Mar 2018 09:25 AM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर Updated Sat, 24 Mar 2018 09:25 AM IST
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Martyrdom day of Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru
डेमाे पिक
भारत के इतिहास में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू वो नाम हैं जिनका जिक्र होते ही देशभक्ति की भावना जाग उठती है। ये शहीद अपने नाम से नहीं बल्कि अपनी सच्ची देशभक्ति के लिए जाने जाते हैं। जब इन वीरों को फांसी की सजा हुई तो पूरा देश रो पड़ा। जानें इस शहीदों की सच्ची देशभक्ति के बारे में... 

23 मार्च को दी गयी इन वीरों को फांसी 

Martyrdom day of Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru
डेमाे पिक
देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे वीर सपूतों में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू का नाम की आता है। ये ऐसे वीर हैं जिन्होंने  फांसी पर चढ़ना स्वीकार किया लेकिन अंग्रेजों के आगे झुके नहीं। इन वीरों को 23 मार्च 1931 को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया। 

जब भगत सिंह पहली बार आजाद से मिले 

Martyrdom day of Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru
डेमाे पिक
भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद के साथ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल हो गए। जब भगत सिंह पहली बार आजाद से मिले तो उन्होने जलती मोमबत्ती पर हाथ रखकर कसम खायी कि अपनी जिंदगी देश के नाम कुर्बान होगी। अपने इस वचन को इन वीरों ने पूरा भी किया। 
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जानें ये विशेष बातें 

Martyrdom day of Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru
डेमाे पिक
- भारत की जनता को डराने के लिए अंग्रेजों ने इन वीरों को दी थी फांसी। जिससे जनता स्वतंत्रता की भावना को भूल जाए और विद्रोह न करे। 
- पंजाब के एक गांव में जन्मे भगत सिंह 12 वर्ष के थे जब जलियांवाला बाग कांड हुआ। तब से उनके मन में अंग्रेजों को मार गिराने की भावना पैदा हुई। 
- जब भगत सिंह को फांसी दी गयी तब वे महज 23 वर्ष के थे। वे चाहते तो अंग्रेजों से माफी मांग कर इस सजा से बच सकते थे, लेकिन देश के वीर सपूत ने झुकना पसंद नहीं किया। 
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इंकलाब जिंदाबाद का नारा 

Martyrdom day of Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru
डेमाे पिक
आजादी की लड़ाई में इंकलाब जिंदाबाद के नारे ने जवानों में जोश भरने का कार्य किया। इस नारे को मशहूर उर्दू कवि हसरत मोहानी ने लिखा था। जिसे 1929 में भगत सिंह ने अपनी आवाज दी। 
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