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पिता फेरी लगाकर बेचते थे पान मसाला, बेटाें ने खड़ी कर दी कराेड़ाें की कंपनी अाैर फिर..
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Wed, 21 Feb 2018 08:16 AM IST
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विक्रम काेेठारी
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बैंक काे हजाराें कराेड़ रुपये की चपत लगाने वाले विक्रम काेठारी की कहानी बड़ी दिलचस्प है। देश-दुनिया में कोठारी परिवार की पहचान पान मसाले के ब्रांड पान पराग से बनी। मनसुख भाई कोठारी ने बेटों दीपक कोठारी और विक्रम कोठारी के साथ वर्ष-1975 में पुड़िया वाला पान मसाला बनाकर बेचना शुरू किया। छोटी पुड़िया में पान मसाला लोगों को बहुत पसंद आया।
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देखते ही देखते पान पराग के साथ कानपुर पान मसाला कारोबार का केंद्र बन गया। यहां एक के बाद एक पान मसाला के ब्रांड खड़े हो गए। मनसुख भाई कोठारी नील वाली गली में किराये के घर में रहते थे। वह फेरी लगाकर नारियल तेल, बिस्कुट और बीड़ी बेचते थे। 70 के दशक में मनसुख भाई ने घर पर पान मसाला बनाकर बेचना शुरू किया।
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दोनों बेटों ने उनके फेरी के काम को पान मसाला इंडस्ट्री में बदल दिया। कोठारी परिवार कानपुर ही नहीं, देश और दुनिया में देश का पहला पान मसाला बनाने के लिए मशहूर हुआ। पान पराग फैक्ट्री का मालिकाना हक मनसुख भाई के पास था। 90 के दशक में विक्रम कोठारी ने पेन बनाने वाली फैक्ट्री रोटोमैक लगाई। यही फैक्ट्री दीपक और विक्रम के बीच विवाद की जड़ बनी।
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कोठारी बंधुओं के कारोबार से जुड़े लोग बताते हैं कि विक्रम रोटोमैक का खर्च पान पराग कंपनी से निकालने लगे। इस पर दीपक ने भी यस ब्रांड से मिनरल वाटर की फैक्ट्री लगा ली। इसके बाद दोनों भाइयों के बीच वैचारिक मतभेद इतना बढ़ा कि मामला बंटवारे तक पहुंच गया। विक्रम ने पिता से पान पराग फैक्ट्री मांगी।
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पिता ने चल-अचल सभी संपत्तियों का समान रूप से बंटवारा करते हुए दीपक को पान पराग और विक्रम को रोटोमैक सौंप दी। इसके बाद विक्रम ने फॉरेन ट्रेड, रियल इस्टेट, फूड, सॉफ्टवेयर आदि व्यवसायों में हाथ आजमाया। रोटोमैक कंपनी की बाजार में अच्छी पकड़ बन गई।