पर्यावरण संरक्षण के लिए कानपुर शहर में कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार की ओर से पॉलिथीन का इस्तेमाल रोका जा रह है। इसी कड़ी में इको फ्रेंडली फैशन को बढ़ावा देने की तैयारी हो रही है। घातक केमिकलों से बचाने के लिए कानपुर में इको फ्रेेंडली ब्यूटी प्रोडक्ट बनाए जा रहे हैं। वहीं, पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने वाले कपड़े और ज्वैलरी को भी बाजार में उतारने की तैयारी हो रही है।
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आयुर्वेद एक्सपर्ट नीरू कोचर ने कई इको- फ्रेंडली कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स बनाए हैं। इनके जरिए वे प्राकृतिक तत्वों के गुण के साथ-साथ घातक केमिकलों के नुकसान भी बता रहीं हैं। उन्होंने त्वचा से लेकर बालों और कई स्किन प्रॉब्लम के लिए आर्गेनिक कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स बनाए हैं। ये सभी उत्पाद फूल और सब्जियों के छिलके से बने हैं। एंटी टैन, स्किन ग्लो, बालों की समस्या आदि के लिए वह प्रोडक्ट्स तैयार करतीं हैं। वह कई शहरों में लगी प्रदर्शनियों में भी इन्हें प्रदर्शित कर चुकीं हैं। इन प्रोडक्ट्स को बनाने से पहले उन्होंने आयुर्वेद की पढ़ाई पूरी की। 2003 से उन्होंने आर्गेनिक कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स बनाने शुरू कर दिए। हाल ही में लखनऊ में नीरू ने प्रदर्शनी लगाई थी। यहां महिला पहलवान गीता फोगाट और साक्षी मलिक को भी नीरू के प्रोडक्ट्स अच्छे लगे थे। नीरू अब दस जुलाई को शहर के एक होटल में लगने वाली प्रदर्शनी में अपने उत्पाद प्रदर्शित करेगी।
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ईको फ्रेंडली कॉस्ट्यूम्स पहने मॉडल
फैशन डिजाइनर मणी निगम और शक्ति सिंह निजी जिंदगी के अलावा अपने काम में भी इको फ्रेंडली प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं। वह डिजाइनर आउटफिट्स में प्लास्टिक और सिंथेटिक फ्रैब्रिक का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करते हैं। वे सिर्फ खादी का ही इस्तेमाल करते हैं। इससे वे वेस्टर्न और इंडियन आउटफिट्स तैयार करते हैं। वहीं, उनसे जुड़े कुछ छात्र प्लास्टिक की आर्टिफिशियल ज्वैलरी की जगह टेराकोटा की डिजाइनर ज्वैलरी का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल ही में लगी एक प्रदर्शनी में इन्होंने अपने उत्पाद पेश किए थे। इन सभी का कहना है कि पर्यावरण बचाना है तो सबको वहीं प्रोड्क्ट इस्तेमाल में लाने चाहिए जिससे पर्यावरण को किसी तरह का नुकसान ना हो।
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कानपुर के शुक्लागंज निवासी रत्नाकर शुक्ला को बचपन से ही पर्यावरण के प्रति खासा लगाव रहा है। इसकी शुरूआत उन्होंने अपने घर से की। रत्नाकर ने घर की छत पर अलग- अलग किस्म के पौधे गमलों में रोपे। फिर उनको आइडिया आया कि क्यों ना घर के बाहर भी पौधे रोपे जाए। इसके लिए उन्होंने अपने ही घर के बाहर जा रही सड़क के किनारे पौधे रोप दिए, जो अब पेड़ बन चुके हैं। रत्नाकर बताते हैं कि दो साल पहले लगाए गए इन पौधों के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। वह बताते हैं कि जब उन्होंने घर के बाहर जा रही सड़क पर पौधे रोपे तो आसपास के लोगों ने विरोध किया और पौधे उखाड़ दिए। यह देखकर उनको काफी बुरा लगा लेकिन पीछे हटने के बजाय उन्होंने अपने पिता के संग जाकर आसपास के लोगों को समझाया और पौधों का महत्व बताया। वर्तमान में अब लोग घरों के बाहर पौधे रोपने को आने लगे हैं। कई तो रत्नाकर को बुलाने आते हैं कि वो उनके भी घर के बाहर पौधे रोप दें। रत्नाकर अपनी पौधे रोेपे मुहिम को आगे लेकर जाएंगे और शहर के कई जगहों पर पौधे रोपेंगे।