स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ओंकारनाथ शास्त्री को मंगलवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। बड़ा बाजार मिर्धान गली स्थित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के आवास पर गदरपुर और बरेली के तहसीलदार आशुतोष गुप्ता की मौजूदगी में गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इस दौरान थाना किला के एसओ पुलिस बल के साथ मौजूद रहे, जिसके बाद तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर की अंतिम यात्रा निकाली गई। सिटी श्मशान भूमि पर सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार किया गया।
यूपी: राजकीय सम्मान के साथ स्वतंत्रता सेनानी की अंतिम विदाई, लंबी लड़ी हक की लड़ाई
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पूर्व प्रधानमंत्री पं. लाल बहादुर शास्त्री के सहपाठी रहे शीर्ष स्वतंत्रता सेनानी बृज मोहन लाल शास्त्री के ज्येष्ठ पुत्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ओंकारनाथ शास्त्री (80 वर्ष) को सोमवार की देर रात अचानक दिल का दौरा पड़ा। आनन-फानन में बेटे अनिल शास्त्री ने पिता को एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। देश की आजादी में महती भूमिका निभाकर बरेली को गौरवान्वित करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के निधन की सूचना से शहर में शोक की लहर दौड़ गई। उनके पार्थिव शरीर को राजकीय सम्मान और गार्ड ऑफ ऑनर देकर अंतिम यात्रा के लिए विदाई दी। इस दौरान उनके आवास पर सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद रहे।
अंग्रेजों के जुल्म सहते हुए क्रांतिकारियों का साथ निभाने वाले ओंकारनाथ शास्त्री को करीब 4 वर्षों तक अपने हक की लड़ाई लड़नी पड़ी, जिसके बाद साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पदवी से नवाजा। सुप्रीम आदेश के बाद सरकार को आजादी के इस रहनुमा के सामने घुटने टेकने पड़े। बेटे अनिल कुमार शास्त्री के मुताबिक दादा बृजमोहन शास्त्री का देहांत होने के बाद पिता उत्तराखंड चले गए। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को मिलने वाली सारी सुविधाएं वहां मिलीं, लेकिन केंद्र सरकार ने सेनानी मानने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्होंने वर्ष 2008 में हाईकोर्ट में केस फाइल किया, जिसमें उन्हें वर्ष 2009 में जीत मिल गई, लेकिन केंद्र ने हाईकोर्ट के फैसले को नहीं मानते हुए सुप्रीम कोर्ट से मुहर लगाकर लाने को कहा। इस पर वर्ष 2009 में ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी। फैसला 14 सितंबर 2011 में उनके हक में आया। आखिर में केंद्र सरकार ने घुटने टेके।
नेताओं में देशभक्ति है दिखावा
अनिल शास्त्री ने कहा कि पिता कहते थे अब कोई भी नेता हो उसमें देशभक्ति नहीं सिर्फ दिखावा है। सब अपनी जेबें भरने के लिए बड़ी योजनाओं का नारा देकर उसकी ओट में लूट मचाते हैं। देश की आजादी के दौरान भी बरेली के मोती पार्क में मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली खां देश के बंटवारे की बात करते थे। कहते थे, बरेली की सड़कों को पाकिस्तान रोड के नाम से जाना जाएगा। पिता कहते थे कि दोनों कौम को यह समझना होगा कि हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई हैं, राजनीति के मोहरे नहीं।
क्रांतिकारी की अधूरी ख्वाहिश
ओंकारनाथ शास्त्री पिता बृजमोहन शास्त्री की प्रतिमा शहर के एक पार्क में लगवाना चाहते थे। ताकि लोग क्रांतिकारियों से प्ररेणा लें और बरेली के इतिहास से परिचित हो सकें। करीब दो साल पहले उन्होंने डीएम को ज्ञापन सौंपा था, जिस पर डीएम ने फन सिटी के सामने पार्क में प्रतिमा लगवाने के निर्देश एनएचआई को दिए थे। एक साल के बाद एनएचआई ने पीडब्ल्यूडी को प्रतिमा लगवाने का जिम्मा सौंप दिया। पिता की प्रतिमा के लोकार्पण का ख्वाब पूरा होने से पहले उनका निधन हो गया।