दशक-दर-दशक नाथनगरी बरेली की तस्वीर बदल रही है। हम सभी को समय का मोल बताता घंटाघर समय के साथ स्मार्ट होता गया तो शहर भी स्मार्ट सिटी बनने की राह पर है। अपनी धरोहरों को सहेजे हुए हम तंग गलियों से निकलकर चौड़ी-चौड़ी सड़कों पर फर्राटा भर रहे हैं। आपके साथ अपनी स्थापना के छठवें दशक (17 जनवरी 1969) में अमर उजाला भी इन बदलावों का साक्षी है। आज हम आपको कुछ ऐसे ही बदलावों से रूबरू करा रहे हैं....
स्थापना दिवस: तरक्की की तस्वीर... यूं बदला अपना बरेली, 'अमर उजाला' बना बदलाव के सफर का साक्षी
कोतवाली
तब : ब्रिटिश काल में कुतुबखाना से शास्त्री मार्केट की ओर जाने वाले मार्ग पर अकब कोतवाली थी। यह वह जगह है जहां 24 मार्च 1860 में रुहेला सरदार नवाब खान बहादुर खान को अंग्रेजों ने सरेआम फांसी की सजा दी थी। अंग्रेजी सरकार में पेंशनर्स होने के बावजूद उन्होंने वर्ष 1857 में क्रांति का विगुल फूंका और क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर स्वतंत्रता आंदोलन को गति प्रदान की थी। उन पर कार्यवाहक कमिश्नर रुहेलखंड डब्ल्यू. रॉबर्ट, ए. शेक्सपीयर जज मुरादाबाद और ए. वेनिस्ट्रेट जज बरेली ने मुकदमा चलाया था।अब : करीब साल भर रुहेलखंड को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद रखने वाले रुहेला सरदार जिस अकब कोतवाली में फांसी की सजा दी गई थी, वह भवन अब जर्जर हो चुका है। इस पुरानी कोतवाली के कुछ अवशेषों में में से दो मीनारें पश्चिम और पूर्व दिशा में और ऊपरी भाग में कंगूरे दिखाई देते हैं। पुरानी दुकानों में कमल फुटवियर, वैद्यनाथ और हमदर्द एजेंसी की दुकानें आज भी मौजूद हैं। अब यह क्षेत्र जाम की चपेट में है। भवन गिरताऊ हालत में है। ऊपरी हिस्सा गिर चुका है। एकबारगी देखने पर कोतवाली नजर नहीं आती।
कमिश्नरी
तब : चौकी चौराहा के पास स्थित कमिश्नरी में रुहेला सरदार नवाब खान बहादुर खान के सहयोगी 257 क्रांतिकारियों को सन 1860 में एक साथ फांसी की सजा दी गई थी। कमिश्नरी में एक बरगद के पेड़ पर उन्हें लटकाया गया था। कथाकारों के मुताबिक कमिश्नर न्यायालय में पुराने बरगद के पेड़ की एक डाल पर 50 क्रांतिकारियों को एक साथ लटकाया गया था, वजन के चलते टूट गई थी। पर अंग्रेजों ने सभी को दोबारा दूसरी डाल पर फांसी पर लटकाया। कालांतर में पेड़ सूखा या कटा, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है।
अब : बरेली कॉलेज के संग्रहालय संचालक शफीक उद्दीन के मुताबिक प्राप्त अभिलेख के अनुसार जिस पेड़ पर सभी क्रांतिकारियों को एक साथ लटकाया गया था। बरगद का वह पेड़ 30 मई 1957 तक मौजूद था। उसके आस-पास के बरगद के पेड़ के नीचे साल 1957 में शहीदों की स्मृति में एक पत्थर लगाया गया था। गुजरते वक्त के साथ संबंधित स्थान पर क्रांतिकारियों की स्मृति संजोने के लिए स्मारक स्थल बना। बैठने के लिए पक्की फर्श और एक खूबसूरत बागीचा बन चुका है। कमिश्नरी अभी भी जस की तस है।
हाफिज रहमत खान का मकबरा
तब : ऐतिहासिक दस्तावेज के मुताबिक मुगल शासन काल में रुहेलखंड स्वतंत्र राज्य बनकर उभरा। बरेली इसकी राजधानी बनी। सन् 1740 में अली मुहम्मद शासक बने उन्होंने राजधानी आंवला में स्थानांतरित की। 1749 में अली मुहम्मद की मौत के बाद उनके बेटों के संरक्षक हाफिज रहमत खान रुहेलखंड के शासक बने। 1774 में शुआउदौला और ब्रिटिश कंपनी की संयुक्त सेना से युद्ध में हाफिज परास्त हुए और मीरानपुर कटरा में उन्होंने दम तोड़ा। उनका मकबरे हुसैन बाग में अब भी मौजूद है।
अब : हाफिज रहमत खान की मौत के बाद हुसैन बाग में उनका विशाल मकबरा बना था। ब्रिटिशर थॉमस एंड विलियम ने 22 मई 1789 में उनके मकबरे की एक बेहद खूबसूरत पेंटिंग बनाई थी। उसके पास के इलाके को दर्शाया था। मगर अब इसकी हालत बेहद जर्जर हो गई है। दीवारों उधड़ चुकी हैं और महज एक गेट और मकबरे का कुछ हिस्सा ही इसकी पहचान है। बताते हैं कि मकबरे की जमीन पर अवैध कब्जों की भरमार है। प्रशासन ने इसे संरक्षित करने का प्रयास किया पर कार्य अधर में ही है।
समाज के विकास में रहता है योगदान
तुलसी मठ के महंत नीरज नयन दास ने कहा कि बचपन से पढ़ाई लिखाई का शौक रहा है। तो अखबार भी पढ़ते रहे। तब से ही अमर उजाला से रिश्ता जुड़ गया। विशेष रूप से संपादकीय पेज हम सब दोस्त जरूर पढ़ते थे। 1980 से हम लोग पढ़ रहे हैं और मंदिर में आज भी पढ़ा जा रहा है। इस समाचार की पत्र खास बात निष्पक्ष पत्रकारिता है। ज्वलंत मुद्दों को उठाता है, राजनीतिक खबरों में भी बेहतर है और संतुलन रहता है। राजनीतिक खबरों के साथ धार्मिक, सामाजिक, जनसमस्या, खेल जगत की खबरें भी बेहतर होती है। अर्थ जगत से भी बहुत जानने को मिलता है। अमर उजाला सभी वर्गो को लेकर चलता है।
सबके दिलों में बसा है अमर उजाला
खानकाह नियाजिया के प्रबंधक शब्बू मियां नियाजी का कहना है कि अखबार आज हर एक के लिए जरूरी है। बल्कि लोगों की सुबह ही अखबार से होती है। मैं 40 साल से अमर उजाला पढ़ रहा हूं। इसकी खास बात यह है कि यह हमेशा निष्पक्ष रहा है। कोई भी दौर रहा हो, किसी का शासन रहा हो। अमर उजाला पर कोई फर्क नहीं पड़ा। अमीर-गरीब का भेद किए हर एक की आवाज उठाता रहा है। किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करता। सभी वर्गों का सम्मान करते हुए दबे कुचलों की भी आवाज उठाता है। ऐसी ही खूबियों से ही अमर उजाला सबके दिलों में बसा है।