बलरामपुर के उतरौला के मधपुर में जहां कभी छांगुर की महफिल सजती थी। आज वहां गर्दा और गुबार है। मलबे से पूरा परिसर पटा है। मधपुर में कोठी का निर्माण 12 करोड़ से हुआ था, जिसमें दो कोठी और अस्तबल बनाए गए थे। इसमें नीतू के नाम से करीब पांच करोड़ खर्च करके एक कोठी बनाई गई थी। बंजर जमीन पर कोठी होने से ध्वस्त करा दी गई। बाहर तो लोगों को बताता था कि विद्यालय खोलेगा, लेकिन पिलर पर भवन का निर्माण कराकर तहखाना बनाने का कार्य करने वाला था। निर्माण कराने वाले ठेकेदार का दावा है कि एक ही कोठी के निर्माण में कई बार बदलाव कराया गया। इससे लागत बढ़ती गई। स्थानीय लोग भी कहते हैं कि धर्म परिवर्तन कराने के लिए ही कोठी का इस्तेमाल होना था। छांगुर की योजना थी कि जो इन्कार करेगा, उसे तहखाने में भेजा जाएगा।
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जमालुद्दीन उर्फ छांगुर
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इनकार नहीं करते थे अधिकारी-कर्मचारी
छांगुर की ठसक ऐसी थी कि सरकारी दफ्तरों में भी उसका दबदबा था। यही कारण रहा कि उतरौला में एक जमीन के दाखिल खारिज पर रोक के बाद भी काम हो गया। एक किशोर से बैनामा कराने के बाद छांगुर के दबाव का ही नतीजा था कि बिना जिलाधिकारी की अनुमति के ही जमीन स्थानांतरित कर दी गई।
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बलरामपुर के मधपुर उतरौला में ढहाया गया मकान
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कोठी का मलबा देख दंग रह गया
एटीएस छांगुर को लेकर स्कार्पियो से घर के पीछे बने गेट से दाखिल हुई। वाहन से उतरते ही छांगुर की नजर कोठी के मलबे पर पड़ी तो वह दंग रह गया। एकटक मलबे को देखता रहा। एटीएस उसे कमरे की ओर लेकर चलने लगी तो उसने आसमान की ओर देखा और दाएं हाथ से दिल को थाम लिया। बिना कुछ बोले ही भरी आंखों के साथ अपने आवास में दाखिल हो गया।
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छांगुर बाबा
- फोटो : अमर उजाला
तीन वर्षों में 500 करोड़ की फंडिंग हुई
जमालुद्दीन उर्फ छांगुर बाबा को बीते तीन वर्षों में करीब 500 करोड़ रुपये की विदेशी फंडिंग हुई है। इसमें से अभी बस 200 करोड़ की ही पुष्टि हो सकी है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार शेष 300 करोड़ रुपये का लेनदेन नेपाल के माध्यम से हुआ है।
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धर्मांतरण की छांगुर स्टोरी: पूरी तरह ध्वस्त हो गया अवैध अड्डा
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फंडिंग के लिए काठमांडू सहित नेपाल के सीमावर्ती जिलों नवलपरासी, रुपनदेही व बांके में 100 बैंक खाते खुलवाए गए। उन्हीं में धर्म परिवर्तन कराने के लिए पाकिस्तान, दुबई, सऊदी अरब व तुर्किए से पैसे भेजे गए। एजेंट चार से पांच प्रतिशत कमीशन पर नेपाल के बैंक खातों से पैसे निकालकर सीधे छांगुर तक पहुंचा देते थे। इसमें कैश डिपॉजिट मशीन (सीडीएम) की भी मदद ली जाती थी।