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अंग्रेजों के छुड़ाए थे छक्के: गणतंत्र दिवस मनाने की अनूठी परंपरा, तिरंगा फहराने के बाद जलते हैं गांव में चूल्हे

Wed, 25 Jan 2023 11:27 PM IST
कपिल kapil अमर उजाला ब्यूरो, बागपत
अमर उजाला ब्यूरो, बागपत Published by: कपिल kapil Updated Wed, 25 Jan 2023 11:27 PM IST
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stoves are lit in the houses after hoisting the tricolor on Republic Day in Baoli village of Baghpat district
बागपत का बावली गांव। - फोटो : amar ujala

देश को आजादी दिलाने की बात रही हो या उसके बाद हुए युद्ध, बागपत का बावली गांव हमेशा देश की खातिर अग्रणी दिखाई दिया है। अंग्रेजों की हुकूमत से लेकर कारगिल युद्ध तक इस गांव में शहीदों की लंबी फेहरिस्त है। वतन पर जान कुर्बान करने का जज्बा सबसे ज्यादा किसी गांव में भरा था तो वह गांव है बावली। 



इस गांव में गणतंत्र दिवस मनाने की भी अनूठी परंपरा है। तिरंगा फहराने के बाद ही गांव में चूल्हे जलते हैं और उसके बाद ही ग्रामीण अन्य किसी काम की शुरुआत करते हैं।

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बावली गांव। - फोटो : amar ujala

ध्वजारोहण के बाद गांव में बने शहीद स्मारक स्थल पर सामूहिक रूप से राष्ट्रगान गाया जाता है। राष्ट्रध्वज की पूजा कर घी के दीपक से आरती उतारी जाती है और घर-घर घी के दीपक जलाए जाते हैं। भोग लगाकर ग्रामीणों के बीच महाप्रसाद का वितरण किया जाता है। खास बात यह है कि ध्वजारोहण के बाद ही गांव के बच्चे अपने स्कूल जाते हैं। समय ऐसा रखा जाता है कि किसी का स्कूल, खेती या मजदूरी न छूटे।

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फाइल फोटो। - फोटो : amar ujala

भूतपूर्व सैनिक सेवा समिति के जिलाध्यक्ष शीशपाल सिंह, सूबेदार धर्मवीर सिंह, सूबेदार महक सिंह, हवलदार सत्यवीर सिंह, भूतपूर्व सैनिक ओमप्रकाश सिंह, सुनील व अशोक चक्र विजेता बिजेंद्रपाल तोमर के भतीजे प्रवीण तोमर, ग्राम प्रधान गौरव तोमर का कहना है कि 26 जनवरी को ध्वजारोहण की यह परंपरा उनके पूर्वजों ने दशकों पहले शुरू की थी। समय के अनुसार इसमें थोड़ा बहुत बदलाव होता रहा है। नहीं बदली है तो ध्वजारोहण से पहले गांव में चूल्हा न जलाने की परंपरा और घरों में घी के दीपक जलाने की।

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स्वतंत्रा सेनानी हरिपाल। - फोटो : अमर उजाला

आजाद हिंद फौज से लड़े हरिपाल
बावली के स्वतंत्रा सेनानी हरिपाल का निधन हो चुका है। वे आजाद हिंद फौज में थे। देश के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में लड़ाई लड़ी। वर्ष 1944-1945 के बीच हुई लड़ाई में अंग्रेजों के छक्के उड़ा दिए थे। इस दौरान हरिपाल सिंह जांघ में गोली लगने से घायल भी हो गए थे।

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स्वतंत्रता सेनानी इलम सिंह - फोटो : amar ujala

25 दिन भूखे-प्यासे रहकर लड़ी लड़ाई
गांव के दूसरे स्वतंत्रता सेनानी इलम सिंह का भी पिछले साल 110 वर्ष की उम्र में निधन हो चुका है। उन्होंने 1941-1942 में 25 दिनों तक सिंगापुर में भूखे-प्यासे रहकर आजादी की लड़ाई लड़ी। इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी और अंग्रेजों से लड़कर छक्के छुड़ा दिए।

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