कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुआ अराजनैतिक किसान आंदोलन रोज करवटें बदल रहा है। पहले राजनीतिक दलों के नेताओं को लंबे समय तक आंदोलन से दूर रखा गया, लेकिन मुजफ्फरनगर की पंचायत और गाजीपुर के घटनाक्रम से तय हो गया कि अब ऐसा नहीं हो पाएगा।
किसान आंदोलन के डंडे में पश्चिमी यूपी की सियासत का झंडा, पढ़िए ये खास रिपोर्ट
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किसानों के बीच खोई राजनीतिक ताकत हासिल करने के लिए रालोद, सपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी आंदोलन के समर्थन में खड़ी हैं। किसान आंदोलन के डंडे में राजनीतिक दल अपने-अपने झंडे के लिए जगह बनाने में जुट गए हैं।
कृषि कानूनों के विरोध से शुरू हुआ आंदोलन भाकियू प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत के आंसुओं तक पहुंच गया। भावनाओं के ज्वार में किसान सिसके तो जाति, मजहब और प्रदेशों की सीमाएं सिमट गईं। रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह के राकेश टिकैत को फोन मिलाने का असर यह हुआ कि हालात बदल गए। विपरीत हालात में पश्चिम यूपी की किसान लॉबी के लिए यह टर्निंग प्वाइंट था।
वहीं रातोंरात किसान एकजुट हो गए और यह मुजफ्फरनगर से लेकर बागपत, सहारनपुर, शामली और बिजनौर समेत पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश में शुक्रवार को नजर आया। दिन निकलते ही जयंत चौधरी गाजीपुर बॉर्डर पर पहुंच भी गए। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राकेश टिकैत से लंबी बातचीत की। आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार किसानों के समर्थन में खड़ी हो गई।
लाल किले के घटनाक्रम के बाद से टूटने की कगार पर पहुंच गए किसान आंदोलन को फिर ताजा हवा मिली है, लेकिन इस हवा में इस बार सियासत के झोंके भी हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से लेकर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव तक में किसान आंदोलन की झलक दिखेगी। सियासी वजूद बचाने की जद्दोजहद में जुटे राजनीतिक दलों के लिए बैठे-बिठाए बड़ा अवसर हाथ लगा है। किसे कितना सियासी फायदा मिलेगा और किसानों के हिस्से में क्या आएगा, इसी पर सबकी नजर रहेगी।
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