मौनी अमावस्या स्नान पर्व पर श्रद्धालुओं का समुद्र ऐसे उमड़ा कि जमाव़ड़े का अनुमान लगाने वाले दंग रह गए। फाफामऊ, झूंसी, जंक्शन, प्रयाग, सिविल लाइंस, नैनी, नेहरू पार्क सहित संगम की ओर जाने वाले सभी रास्तों पर बस श्रद्धालुओं की कतारें ही दिखीं। भोर के धुंधलके से लेकर देर शाम तक पुण्य की डुबकी लगाने की कामना के साथ स्नानार्थियों का संगम क्षेत्र में उमड़ना जारी रहा। ‘एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, अ कान्हीं पर बोरी, कपारे पर बोरा’ के साथ अमवसा का मेला परवान चढ़ता रहा और जनकवि कैलाश गौतम की पंक्तियां कालजयी होती रहीं।
एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, अ कान्हीं पर बोरी, कपारे पर बोरा
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तेलियरगंज में रहकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले विवेक, शालिनी ने भी बछिया की पूंछ पकड़कर गोदान किया। गोदान के प्रति न सिर्फ उन्होंने आस्था जताई बल्कि इसका महत्व भी समझाया।साथ आए अन्य युवाओं ने भी गंगापुत्र घाटिया से तिलक चंदन लगवाने के साथ ही सेल्फी भी ली। पास ही फूल माला बेचने वाले कतार में बैठे श्रद्धालुओं को आवाज लगाते रहे। हालांकि दूध वाले तो घुटने भर पानी में खड़े होकर श्रद्धालुओं से दूध चढ़ाने का आग्रह करते रहे।
गाेंडा के मंजीत ने सिर पर बिछौना जबकि गले में अंगोछे का झूला बनाकर बेटे को सुला रखा था। तेजी से आगे बढ़ते कदमों की मंजिल संगम तक पहुंचना था ताकि डुबकी लगा सकें। संगम से त्रिवेणी बांध की तरफ आने पर मेले की विविधता दिखी। एक ही कतार लेकिन अलग-अलग जगहों से आए श्रद्धालु अपनी वेशभूषा के कारण अपने प्रदेेश का प्रतिनिधित्व करते रहे। तमिल, तेलगू, मराठी, कन्नड़, मलयालम, हिंदी, भोजपुरी, मैथिल सभी भाषाएं, बोलियां अलग अलग टोलियों में बिखरती और एकाकार होती रही।
मेले में शिविर-शिविर भंडारे
मेले में शिविर-शिविर भंडारे रहे जहां स्नान करके लौटते लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया। स्वामी अधोक्षजानंद देवतीर्थ के ओल्ड जीटी रोड स्थित शिविर, श्रीमद्भागवत के आचार्य अमिताभ जी के संगम लोअर स्थित शिविर में सब्जी-पूड़ी के साथ चाय भी बांटी गई। काली मार्ग पर बांध के नीचे भंडारे से प्रसाद लेकर निकली दिव्या, आरती, रोहित ने माना कि ऐसी स्वादिष्ट खिचड़ी शायद पहली बार मिली। पैदल चलने पर जोर की भूख लगी थी लेकिन प्रसाद पाकर आनंद आ गया। मेले के तमाम शिविरों में ऐसे ही प्रसाद का वितरण जारी रहा।
डुबकी लगाने के साथ गोंडा र्से आइं रीता देवी की आस पूरी हुई तो भूख परेशान करने लगी। सो बिना बिलंब किए वहीं घाट से थोड़ी दूर पर मिट्टी में ही गड्ढा खोदकर चूल्हा बनाया गया जो तेज हवा में भी बिना बुझे जला। इसी पर हलुआ पूड़ी तैयार करके पहले गंगा माई को चढ़ाया गया और इसी को प्रसाद समझकर सभी ने ग्रहण भी किया। संगम तट पर बने टावर के पास पूड़ी-हलवा बनाने के लिए चूल्हा बनाने में बेटे ने मदद की। लकड़ी और गुड़-आटा वह साथ लाई थी।
हे राजेश हम हेरा गइल हई
श्रद्धालुओं के संगम में जरा सी चूक हुई तो अपनों से बिछ़ड़ना तय रहा। हालांकि इसके लिए स्नान घाटों की ओर पोल पर नंबर लिखे थे ताकि जहां पर कपड़े उतार गए डुबकी लगाने गए थे, वहीं पर आसानी से लौट आएं। इसी आपाधापी में मऊ से आईं राजेश्वरी अपने बेटे से भूल गईं। पुलिस वालों की मदद से संगम टॉवर पहुंचकर परेशान राजेश्वरी ने अपनी जानकारी इस तरह दी कि वहां मौजूद लोगों को हंसी आ गई। राजेश्वरी ने अपना नाम, पता बताए बगैर बेटे राजेश को ही आवाज दी। बोलीं, हे राजेश हम हेरा गइल हई। उनकी आवाज सुनकर मां को खोजता हुआ बेटा राजेश थोड़ी ही देर में टॉवर के करीब आकर मां को ले गया।
इसी तरह सोनभद्र से आई सुनीता अपनी बहू सुप्रिया के साथ स्नान करके निकलीं थीं लेकिन निर्धारित स्थान को भूल गईं। हालांकि, कपड़े के पास बैठे बेटे की नजर लगातार उन दोनों पर थी, सो जैसे ही मां को बहू सुप्रिया को खोजते देखा, उसने खुद आगे बढ़कर मां की अंगुली थाम ली और उन्हें कपड़ा बदलने वाली जगह पर ले आया। यह नजारा आम रहा।