सिखों से मिलती-जुलती वेशभूषा, सिर पर दशनामी पगड़ी के साथ काली पट्टी पर तांबे-पीतल से बने गुलदान में मोर के पंखों का गुच्छ। सामने की ओर ‘सर्प निशान’ के अतिरिक्त कॉलर वाले कुर्ते पहने और हाथ में खझड़ी, मजीरा, घंटियां लिए साधुओं का दल अखाड़ों की छावनी में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
मूलत: शैव संप्रदाय से जुड़े जंगम साधुओं का डेरा-फेरा शैव अखाड़ों की छावनी के ही इर्द-गिर्द है। संगम की रेती पर नागा संन्यासियों संग संतों-महंतों, महांडलेश्वरों की निराली दुनिया के बीच भजन करके आजीविका चलाने वाले जंगम साधु शिवनाम की अलख जगाने में जुटे हैं।
जंगम साधु मूलत: दशनाम अखाड़ों के भाट हैं, जो अपनी अलग, अनूठी अभिनय संवाद शैली में अखाड़ों की गौरव गाथा के साथ ही शिव की कथा भी अत्यंत रोचक तरीके से सुनाते हैं। इनका काम दशनाम संन्यास की परंपराओं का गुणगान करना है। ये पूर्वजों से लेकर अब तक की कहानी गेयशैली में इस तरह कहते हैं कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध होकर बस सुनता ही रहे।
‘अमर उजाला’ से बातचीत में निरंजनी के मेला प्रधान महंत दिनेश गिरि ने कहा, दशनाम परंपरा का गुणगान करने वाले जंगम साधुओं की खूबी यह है कि ये दशनाम परंपरा के गौरवगान से लोगों को जोड़ते हैं। खास यह भी कि ये ‘भेंट’ को हाथ से नहीं लेते बल्कि अपनी घंटी को उलट करके उसी में दक्षिणा लेते हैं। एक अखाड़े से दूसरे अखाड़े में घूमते, कथा सुनाते जंगम साधुओं का यह क्रम पूरे मेले के दौरान जारी रहेगा।
पुरखों से चली आ रही परंपरा
निरंजनी अखाड़े में पहुंचे अजेश जंगम, सोनू जंगम, रमेश जंगम, संदीप जंगम, राजेश जंगम ने कहा कि दशनाम अखाड़ों का गौरव गान करना पुरखों की परंपरा से चला आ रहा है। हमारा मकसद संतों ही नहीं श्रद्धालुओं के बीच भी अखाड़ों के गौरव से परिचित कराना है। हम सिर्फ मेलों में ही आते हैं, बाकी दिनों में किसी धार्मिक स्नान पर भ्रमण करते हैं। हममें से कई साथी परिवार के साथ ही रहते और आजीविका के लिए खेती या दूसरे कार्य भी करते हैं।