15 जनवरी से प्रयागराज में शुरू होने जा रहे कुंभ मेले से पहले विश्व भर के साधु-संतों का जमावड़ा शुरू हो गया है। विदेशी संतों के साथ यहां तमाम देशों के श्रद्धालुओं का आना भी जारी है। विदेश से आए संतो ने अपने शिष्यों के साथ अपने अखाड़ों की पेशवाई में हिस्सा भी लिया है।
महानिर्वाणी अखाड़े की पेशवाई में मंगलवार को कई देशों के विदेशी संतों के साथ साध्वियां भी पहुंचीं। अखाड़े के शिविरों में विदेशी बाबाओं के निराले अंदाज देखते बने। कुंभ तक विदेशी संत अखाड़े की परंपरा के अनुसार शिविरों में ध्यान, पूजा, जप और योग करते नजर आएंगे।
आस्ट्रिया से विदेशी शिष्याओं के साथ कुंभ में प्रवास केलिए पहुंची साध्वी उमा पुरी महानिर्वाणी अखाड़े की पेशवाई में रथ पर सवार होकर निकलीं तो उनकी झलक पाने के लिए लोग आतुर हो उठे। अमर उजाला से बातचीत में साध्वी उमा का कहना था कि प्रयागराज के कुंभ की आध्यात्मिक ताकत उन्हें यहां तक खींच लाई। सुना है कि यह भूमि सृष्टि की रचना से जुड़ी है।
यहां अक्षयवट के रूप में विराजमान ज्ञान की जड़ों का वह दर्शन करेंगी। इसी तरह सनातन धर्म को अपना चुकीं आस्ट्रिया से आईं देवी लक्ष्मी ने भी कुंभ की दिव्यता का बखान किया। कहा कि ऐसा संत समागम उन्होंने कभी नहीं देखा था। उनके लिए यह अविस्मरणीय अवसर है। उन्होंने बताया कि वह अपने गुरु परमहंस स्वामी महेश्वरानंद के संदेशों का प्रचार कर रही हैं। सनातनी धर्म-संस्कृति से प्रभावित लक्ष्मी कुंभ तक यहीं रहेंगी।
इसी तरह स्लोवाकिया की देवी डासी भी शिविर में ध्यान लगाकर मनका फेरती रहीं। कुंभ में संतों के जमावड़े का हिस्सा बने आस्ट्रिया के स्वामी प्रेमानंद पुरी का कहना था कि कुंभ की परंपरा और भारत की सनानती संस्कृति पूरी दुनिया के लिए अनुकरणीय है। वह इस कुंभ में शाही स्नान में भी हिस्सा लेंगे। इसके अलावा अखाड़े की परंपरा के अनुसार धूनी रमेगी। संध्या-पूजा, ध्यान-योग होगा। क्रोएशिया के बाबा ज्ञानेश्वर पुरी महाराज ने भी डेरा जमा लिया है। वह संगम की रेती पर बने फूस के शिविर में संतों के बीच कुंभ तक त्रिवेणी में पुण्य की डुबकी लगाएंगे। उनका कहना है कि यहां कुछ सीखने और अपनाने के लिए आए हैं। यहां के अनुभवों को अपने वतन के लोगों के बीच साझा करेंगे।