इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सार्वजनिक व निजी संपत्ति वसूली अध्यादेश 2020 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर राज्य सरकार से 25 मार्च तक जवाब तलब किया। कोर्ट इस मामले की सुनवाई 27 मार्च को करेगी। अधिवक्ता शशांक श्री त्रिपाठी ने याचिका दाखिल कर इस संबंध में लाए गए अध्यादेश की वैधानिकता को चुनौती दी है ।
लोक संपत्ति नुकसान वसूली अध्यादेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किया जवाब तलब
याचिका में कहा गया कि सीआरपीसी और लोक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम 1984 में पहले से प्रावधान मौजूद है इसके बावजूद अध्यादेश लागू करने का उद्देश्य न सिर्फ स्थापित कानूनों का अतिक्रमण करना है बल्कि हाईकोर्ट द्वारा आठ मार्च को पोस्टर हटाने के संबंध में दिए निर्णय को ओवर रूल करना है।
राज्य सरकार की ओर से उपस्थित महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह ने याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अध्यादेश को याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती है। इसमें चुनौती देने का कोई आधार नहीं बताया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में अध्यादेश लागू कर दंगों और प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक व निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों से नुकसान की वसूली का कानून लागू किया है।
अध्यादेश में यह भी प्रावधान है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपियों के फोटो तथा विवरण सार्वजनिक किए जा सकेंगे। इसी संबंध में गत आठ मार्च को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से लखनऊ में आरोपियों के पोस्टर हटाने का इस आधार पर निर्देश दिया था की सरकार द्वारा की गई कार्यवाही किसी कानून के दायरे में नहीं आती है।
इसके बाद प्रदेश सरकार ने अध्यादेश लाकर यह कानून लागू किया है। याची का कहना है कि प्रदेश सरकार द्वारा लाया गया अध्यादेश निजता के अधिकार का हनन करता है। अधिकरण में न्यायिक सदस्यों को स्थान नहीं दिया गया है। याचिका पर 27 मार्च को अगली सुनवाई होगी।