{"_id":"5cd56781bdec220755417c2d","slug":"ramadan-2019-hindu-inmates-roza-with-muslim-at-dargah-majgaj-sabari","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"यहां 'राम-रहीम' में नहीं कोई फर्क, रोजेदार हिन्दू को मुस्लिम पढ़ाते नमाज, इफ्तारी बनाते हैं ईसाई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यहां 'राम-रहीम' में नहीं कोई फर्क, रोजेदार हिन्दू को मुस्लिम पढ़ाते नमाज, इफ्तारी बनाते हैं ईसाई
Sat, 11 May 2019 01:16 PM IST
Abhishek Saxena
अभिषेक सक्सेना, अमर उजाला, आगरा
अभिषेक सक्सेना, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Sat, 11 May 2019 01:16 PM IST
विज्ञापन
दरगाह मरकज साबरी पर रोजा रखते हिंदू और मुस्लिम
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इबादत के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन, ईश्वर, अल्लाह, यीशु एक ही है। सर्वधर्म सद्भावना की नजीर पेश करते दिखते हैं आगरा के प्रतापपुरा चौराहे स्थित दरगाह मरकज साबरी में आने वाले लोग। सुलहकुल की नगरी में भाईचारे की मिसाल देखने को मिल रही है। यहां आने वाले ज्यादातर लोग हिंदू हैं और उन्होंने दिखा दिया है कि राम और रहीम में कोई फर्क नहीं है।
दरगाह मरकज साबरी आगरा क्लब
- फोटो : अमर उजाला
ताजनगरी की इस दरगाह में 80 प्रतिशत हिंदू अपनी आस्था जताते हैं। हिंदू जितनी शिद्दत से नवरात्रि के दौरान व्रत रखते हैं, उतनी ही रमजान में रोजे रखने और अपने मुसलमान भाइयों के साथ नमाज पढ़ने में भी वे पीछे नहीं रहते। रमजान के हर रोज यहां इफ्तार में सिर्फ शाकाहारी व्यंजन बनते हैं। मुसलमान भाइयों को इफ्तार कराने के लिए हिंदू महिलाएं यहां पूरी और सब्जी बनाती हैं। दरगाह के सज्जादानशीन पीर अलहाज रमजान अली शाह चिश्ती साबरी यहां महफिल सजाते है।
रोजे के दौरान दरगाह पर मौजूद महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
इंतजामिया कमिटी के सदस्य विजय जैन बताते हैं कि 'हमारे पीर खुद भी मांसाहार पसंद नहीं करते थे ऐसे में यहां सिर्फ शाकाहार व्यंजन परोसे जाते हैं।बकौल विजय जैन खुद 25 साल से रोजा रख रहे हैं। रमजान के दौरान उन्हें तसबीह (इबादत की माला) के मनके गिनते हुए अल्लाह का नाम लेते देखा जा सकता है। तमाम हिंदुओं के साथ विजय भी शाम को नमाज अता करने के बाद इफ्तार में शरीक होते हैं। किसी का धर्म यहां नहीं पूछा जाता। एकता की ऐसी मिसाल शायद दुनिया में कहीं और देखी नहीं जाती, जितनी आगरा के इस दरगाह में देखने को मिलती है।
विज्ञापन
विज्ञापन
दरगाह मरकज साबरी आगरा
- फोटो : अमर उजाला
दरगाह के सज्जादानशीं पीर अल्हाज रमजान बताते हैं कि कभी भी किसी आने वाले से ये नहीं पूछा गया कि उसका मजहब क्या है। ज्यादातर हिंदुओं के परिवार यहां आते हैं, खिदमत करते हैं और कई परिवार ऐसे हैं जो नवरात्रि में व्रत और रमजान में एक महीने तक रोजा रखते हैं। उन्हें किसी ने कभी रोजा रखने को नहीं कहा। स्वतः स्फूर्त इच्छा से लोग यहां इस्लाम में बताए गए इस जरूरी काम करते हैं।
विज्ञापन
दरगाह मरकज साबरी पर रोजा रखते हिंदू और मुस्लिम
- फोटो : अमर उजाला
दरगाह मरकज साबरी में करीब-करीब रोज आने वाले अकीदतमंदों के मुताबिक 40 साल पहले बच्चे की चाहत में यहां उन्होंने सजदा किया था। फिर रोजे रखना और नमाज अदा करनी शुरू की। रमजान में रोजा रखतीं हैं और नमाज पढ़ती हैं। पीर साहब ने कहा था, अगर इबादत के बदले कोई ख्वाहिश ऊपरवाले से की जाएगी, तो वो सौदेबाजी होगी। बिना लालच के इबादत करोगे तो सबकुछ मिलेगा।' इसी फलसफे पर वह और शैल अब तक कायम हैं।