श्राद्ध का पितरों के साथ अटूट संबंध है बिना पितरों के श्राद्ध की कल्पना नहीं की जा सकती। श्राद्ध पितरों को आहार पहुंचाने का माध्यम मात्र है। श्राद्ध करते वक्त संकल्प व्यक्त किया जाता है कि मेरे वो पितर जो प्रेतरूप हैं, तिलयुक्त जौ के पिंडों से तृप्त हों। साथ ही सृष्टि में हर वस्तु ब्रहमा से लेकर तिनके तक चर हो या अचर हो मेरे द्वारा दिये जल से तृप्त हों।
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हरिपदी में पूर्वजों को जल देकर तर्पण करते लोग
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पं. प्रद्युम्न निर्भय ने बताया कि वसु, रूद्र और आदित्य श्राद्ध के देवता माने गये हैं। हर व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा और पर दादा क्रम से वसु, रूद्र और आदित्य के समान माने जाते हैं। श्राद्ध के वक्त वे ही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। वे श्राद्ध कराने वालों के शरीर में प्रवेश करके और ठीक ढंग से रीति रिवाजों के अनुसार कराए गए श्राद्ध कर्म से तृप्त होकर वे अपने वंशधर को सपरिवार सुख समृद्धि व स्वास्थय का आशीर्वाद देते हैं।
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पितृपक्ष में सोरों के हरिपदी में पहुंचे श्रद्घालु
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पितृपक्ष में उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान, मध्य प्रदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का पहुंच रहे हैं। श्रद्धालु गंगा घाटों पर पहुंचकर अपने पितरों का श्राद्ध कर्म कर रहे हैं। कछला गंगा घाट, लहरा घाट पर श्रद्धालुओं के पहुंचने से भीड़ का आलम है। सुबह से ही श्रद्धालु गंगा स्नान करने का क्रम शुरू कर देते हैं। उनके द्वारा तीर्थ पुरोहितों की मदद पूजा अर्चना में ली जा रही हैं।
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गंगाघाट पर तर्पण को उमड़ रहे लोग
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पंडितों द्वारा वराह घाट, लक्ष्मन जी घाट, भागीरथी गंगा मंदिर घाट व लाल घाट पर विशेष श्राद्ध कर्म अनुष्ठान कराए गए। सुबह से लेकर देर शाम तक धार्मिक एवं श्राद्ध कर्म किए गए।
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गंगाघाट पर पूजा अर्चना करते श्रद्घालु
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तीर्थ पुरोहित पितरौ को पिंडदान, जल तपर्ण, श्राद्ध कर्म विधि विधान से करा रहे हैं। गंगा स्नान कर श्रद्धालुओं के द्वारा ब्राह्मणों को भोजन कराया गया और वस्त्र आदि दान किए गए। परिक्रमा मार्ग पर बने मंदिरों पर पूजा अर्चना की गई। मंदिरों पर देव दर्शन कर परिवार की खुशहाली की कामना की।