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पांडवों ने यहां भी काटा था अज्ञातवास, पैदा हुए लवकुश, ऐसी है महर्षि की तपोभूमि की कहानी

Thu, 14 Nov 2019 10:23 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मैनपुरी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मैनपुरी Published by: Abhishek Saxena Updated Thu, 14 Nov 2019 10:23 AM IST
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Markandeya Rishi Tapobhumi Untold History in Mainpuri District
महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि - फोटो : अमर उजाला
विकास खंड घिरोर की ग्राम पंचायत विधूना स्थित मार्कंडेय ऋषि तपोभूमि पर कार्तिक पूर्णिमा से लक्खी मेले की शुरुआत हो गई। यह मेला न केवल जनपद के लिए बल्कि प्रदेश भर के लोगों के लिए प्रसिद्ध है। महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि त्रेता और द्वापर युग की कई किवंदतियों को अपने आप में समेटे हुए है। 

 
Markandeya Rishi Tapobhumi Untold History in Mainpuri District
महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि - फोटो : अमर उजाला
गांव विधूना स्थित मार्कंडेय मेले का इतिहास काफी पुराना है। यहां हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगाता है। कार्तिक पूर्णिमा की रात 12 बजे से ही हजारों की संख्या में श्रद्धालु पवित्र सरोवर में डुबकी लगाते हैं। पूरे सप्ताह मेला लगाया जाता है। मेले का महत्व न केवल धार्मिक उद्देश्य से है बल्कि क्षेत्रीय लोगों के लिए भी इसका बहुत बड़ा महत्व है। 
 
Markandeya Rishi Tapobhumi Untold History in Mainpuri District
(टीला) पांडवों ने अज्ञातवास के दिन भी यहीं व्यतीत किए - फोटो : अमर उजाला
मार्कंडेय ऋषि की तपोभूमि विधूना का संबंध महाभारत काल से भी बताया जा रहा है। बताया जाता है कि महाभारत काल के विधुर का यहीं टीला था। उनके नाम से ही इस गांव का नाम विधूना पड़ा। बताते हैं कि पांडवों ने अज्ञातवास के दिन भी यहीं व्यतीत किए थे। पांडवों के चबूतरों के अवशेष भी यहां मिलते हैं। 
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Markandeya Rishi Tapobhumi Untold History in Mainpuri District
मार्कंडेय ऋषि की तपोभूमि - फोटो : अमर उजाला
मार्कंडेय ऋषि की तपोभूमि विधूना से मात्र 200 मीटर की दूरी पर नहर के दूसरी तरफ सीता की रसोईया के रूप में एक मंदिर निर्मित है। पांच दशक पूर्व यहां बन था। इस स्थान को आज भी बनकटा के नाम से जाना जाता है। बताते हैं कि वाल्मीकि की यहीं कुटिया थी। सीता ने लवकुश को यहीं जन्म दिया था।
 
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Markandeya Rishi Tapobhumi Untold History in Mainpuri District
महर्षि मार्कंडेय के पवित्र सरोवर में स्नान करते श्रद्घालु - फोटो : अमर उजाला
कार्तिक पूर्णिमा की रात 12 बजे से ही हजारों की संख्या में श्रद्धालु पवित्र सरोवर में डुबकी लगाते हैं। मार्कंडेय ऋषि को सभी तीर्थों का भांजा माना गया है। कहा जाता है कि यदि किसी तीर्थ का स्नान व दर्शन न कर पाएं तो मार्कंडेय ऋषि के दर्शन करें। वे सभी तीर्थों के मान्य हैं। इसलिए उनका महत्व बढ़ जाता है। 
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