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विजय दिवस: जनरल नियाजी को समर्पण के लिए किया था मजबूर, जंग में आगरा के रणबांकुरों ने निभाई थी खास भूमिका

Wed, 16 Dec 2020 02:15 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Wed, 16 Dec 2020 02:15 PM IST
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Kargil Vijay Diwas 16th December 1971: Vijay Diwas India Pakistan 1971 War Experience Of Battle Told By Colonel GM Khan
विजय दिवस: युद्ध में शामिल होने वाले योद्धा - फोटो : अमर उजाला
11 दिसंबर, 1971 को 2 पैरा रेजिमेंट के 800 से अधिक छाताधारी सैनिकों को कोलकाता के दमदम और क्लाइकोंडा हवाई अड्डे से 50 मालवाहक विमानों में बिठाकर शाम सात बजे तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के तंगेल नाम स्थान पर उतारा गया। इस जगह का चयन आगरा में तैनात सिग्नल ऑफिसर कैप्टन पीके घोष ने छद्म रूप में बांग्लादेश जाकर मुक्ति वाहिनी की मदद से किया था। छाताधारी सैनिकों ने 24 घंटे की लड़ाई में 350 से अधिक दुश्मन सैनिकों को मार डाला। फिर वह पूर्वी पाक सेना के हेड क्वार्टर में घुस गए और वहां से जनरल नियाजी को कब्जे में ले लिया। यही लड़ाई का निर्णायक मोड़ था। भारतीय सैनिकों को अपने सामने देख जनरल नियाजी के होश उड़ गए। वह चिल्लाकर बोले- रावलपिंडी के लोगों ने हमें मरवा डाला...। उसके बाद 93 हजार पाक सैनिकों को समर्पण करने पर मजबूर होना पड़ा।  
Kargil Vijay Diwas 16th December 1971: Vijay Diwas India Pakistan 1971 War Experience Of Battle Told By Colonel GM Khan
1971 का भारत पाक युद्ध - फोटो : सोशल मीडिया
आगरा स्थित छाताधारीबिग्रेड के पूर्व कैंप कमांडेंट कर्नल जीएम खान ने 71 की लड़ाई की स्मृतियों को साझा करते हुए यह बताया। बोले कि आगरा के छाताधारी सैनिकों का अचानक दुश्मन के इलाके में पहुंचकर पाकिस्तान की सेना को ढाका तक न पहुंचने देना जीत का टर्निंग प्वाइंट था। हालांकि उस लड़ाई में 2 पैरा रेजिमेंट के सात जवान शहीद और 20 घायल हुए थे। आगरा में छाताधारी सैनिकों को कमांडो और सर्जिकल स्ट्राइकर के रूप में तैयार किया जाता है।
 
Kargil Vijay Diwas 16th December 1971: Vijay Diwas India Pakistan 1971 War Experience Of Battle Told By Colonel GM Khan
1971 का भारत पाक युद्ध
कठिन परिस्थितियों में खाली कराई पोस्ट
मोहल्ला अर्जुन नगर निवासी रिटायर्ड कर्नल राजेंद्र सिंह बताते हैं कि जाट रेजिमेंट में उनकी पलटन को मई, 1971 में मिजोरम में तैनाती मिली थी। हमें अगरतला में दुश्मन की पोस्ट बर्बाद करने का आदेश मिला। कठिन परिस्थितियों में आमने-सामने की लड़ाई में पलटन ने दुश्मन सेना को खदेड़कर पोस्ट खाली करा ली। तीन दिसंबर को भारत-पाक युद्ध में उनकी पलटन ने दुश्मन को पीछे खदेड़कर मैनावती कैंट को कब्जे में लिया। कर्नल राजेंद्र सिंह के अनुसार उनके निर्देशन में पाक सेना के 16 अधिकारी और 2000 सैनिकों ने तत्कालीन बिग्रेड कमांडर बिग्रेडियर केपी पांडेय के समक्ष अपने हथियार डालकर आत्मसमर्पण कर दिया। 
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Kargil Vijay Diwas 16th December 1971: Vijay Diwas India Pakistan 1971 War Experience Of Battle Told By Colonel GM Khan
1971 का भारत पाक युद्ध
अचानक हमले से हिल गई पाकिस्तान सेना
लॉयर्स कॉलोनी निवासी मेजर जनरल प्रताप दयाल ने बताया कि बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में पाक पर हवाई हमले की योजना बनी थी। 2 पैराशूट बटालियन को हमले केलिए चुना गया। पलटन को कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन में गुप्त तरीके से रखा गया। 11 दिसंबर, 1971 को बटालियन को दुश्मन के इलाके में ले जाया गया। पैराशूट से कूदने के बाद लॉसजंग नदी के पोंगली पुल पर भारतीय जवानों ने पोजीशन ले ली। शाम सात बजे पाक सेना का काफिला जैसे ही पुल से गुजरा, जवानों ने उन पर हमला कर दिया। अचानक हमले से पाक सेना हिल गई। उसे संभलने का मौका नहीं मिला। भयंकर युद्ध में दुश्मन के बहुत से सैनिक मारे गए और तमाम घायल हुए। पाक सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी और वह ढाका नहीं पहुंच पाई। भारतीय सेना 15 दिसंबर को ढाका पहुंची, 18 दिसंबर 1971 को नया देश बांग्लादेश बनने के बाद ही स्वदेश वापस आई। 
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Kargil Vijay Diwas 16th December 1971: Vijay Diwas India Pakistan 1971 War Experience Of Battle Told By Colonel GM Khan
रुदमुली में शहीद स्मारक - फोटो : अमर उजाला
रुदमुली के 88 जांबाजों ने खदेड़ी थी पाकिस्तान की फौज
16 दिसंबर, 1971 का विजय दिवस याद आते ही बाह के रुदमुली गांव के हर युवा का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। ये वही दिन है, जब रुदमुली के रणबांकुरों ने पाकिस्तान की ढाका, अकोरा, हिल्ली पोस्ट पर कब्जा कर तिरंगा फहरा दिया था। जंग में बाह तहसील के 350 जवान शामिल रहे। इनमें से 88 रुदमुली गांव के थे। जंग में शामिल वीर सपूत रुदमुली के सर्वजीत सिंह, कैप्टन निहाल सिंह, महेंद्रपाल सिंह, रतिभान सिंह कहते हैं कि युद्ध विराम न होता तो लाहौर पर भी भारतीय झंडा फहरा देते। जंग में जसकरन सिंह शहीद हुए थे। 
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