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क्रिसमसः कभी जहांगीर ने तुड़वाया था अकबर के नाम पर बना उत्तर भारत का पहला 'अकबरी चर्च'
Wed, 25 Dec 2019 12:49 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Wed, 25 Dec 2019 12:49 AM IST
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सेंट पीटर्स चर्च परिसर में स्थित अकबरी चर्च
- फोटो : अमर उजाला
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ताजनगरी में सबसे प्राचीन गिरजाघर वजीरपुरा में सेंट पीटर्स चर्च परिसर में स्थित अकबरी चर्च है। इसकी स्थापना मुगल बादशाह अकबर ने 1600 ईस्वी में करवाई थी। अकबर ने इसी चर्च के साथ ही लाहौर में भी अकबरी चर्च बनवाया था। इस चर्च को कई बार तोड़ा गया, जलाया भी गया मगर 1772 में इसका पुनर्निर्माण करवाया गया। तब से यह चर्च इसी स्वरूप में स्थित है।
प्राचीन गिरजाघर 'अकबरी चर्च'
- फोटो : अमर उजाला
उत्तर भारत के पहले चर्च का निर्माण मुगल बादशाह अकबर ने दीन-ए-इलाही धर्म की स्थापना के बाद करवाया। इस धर्म में उन्होंने सभी धर्मों के साथ सद्भाव की बात कही थी। इसके बाद ही अकबर ने मरियम जमानी नामक ईसाई महिला से निकाह किया। मरियम बेगम का मकबरा भी सिकंदरा में मरियम टूम के नाम से है।
अकबरी चर्च
- फोटो : अमर उजाला
फादर मून लाजरस बताते हैं कि अकबर ने लाहौर और आगरा में गोवा के पादरियों को गिरजाघरों की स्थापना की इजाजत दी थी। लाहौर का चर्च भी आज तक स्थित है। लेकिन आगरा के अकबरी चर्च को कई बार तोड़ा जा चुका है। अकबर की मृत्यु के बाद मुगल शासक जहांगीर ने इसे तुड़वा दिया था। इसके बाद उसे गलती का अहसास हुआ तो दोबारा बनवाया गया। बाद में पर्शिया की सेना ने भी इस चर्च को तोड़ा था, जिसे पुन: बनवाया गया। इसके बाद इस चर्च में आग लग गई। आसपास की इमारत और लाइब्रेरी भी जल गईं थीं। वर्ष 1772 में इस चर्च का पुननिर्माण करवाया गया, तब से आज तक अकबरी चर्च इसी स्वरूप में मौजूद है।
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अकबरी चर्च
- फोटो : अमर उजाला
आगरा महाधर्मप्रांत के मीडिया प्रभारी फादर मून लाजरस बताते हैं कि जहांगीर के पौत्र ने अकबरी चर्च में ईसाई धर्म ग्रहण किया था। इस चर्च से ही उत्तर भारत में ईसाई धर्म फला-फूला। हालांकि चर्च को कई बार उजाड़ा गया। अब यह 1772 ईस्वी से अपने मूल स्वरूप में है।
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माता निष्कलंक गिरिजाघर
सेंट पीटर्स परिसर में रहने वाले राजेश विल्सन का कहना है कि अकबरी चर्च से कई किवंदतियां जुड़ी हुई हैं। इस चर्च के पिछवाड़े में कब्रिस्तान था। मुगल काल में ईसाई समाज के पादरी वगैरह को इसी कब्रिस्तान में दफनाया जाता था। इंग्लैंड व अमेरिका से भी यहां ईसाई समाज के लोग सबसे पहले आए थे।