आगरा में तैनात महिला पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को लंबा संघर्ष करना पड़ा है इस मुकाम तक पहुंचने के लिए। इनमें जुनून ऐसा था कि संघर्ष से कभी डरीं नहीं। पिता ने सपना देखा बेटी के पुलिस अफसर बनने का तो उसे पूरा करने में जी-जान से जुट गईं। जमाने ने ताने दिए, पुलिस में जाकर क्या करोगी? लेकिन हिम्मत नहीं हारी। महकमे में आने के बाद भी इनकी परीक्षा समाप्त नहीं हुई।
अपराजिता: जमाने के ताने सुनकर भी पुलिस में आईं बेटियां, परिवार के साथ निभा रहीं 'खाकी' का फर्ज
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पिता का सपना पूरा करने के लिए बनी अधिकारी
पिता प्रशासनिक सेवा में जाना चाहते थे, लेकिन जा नहीं पाए। उनके सपने को मैंने अपना लक्ष्य बनाया। प्रयागराज से पढ़ाई की। एमटेक किया। निजी कंपनी में भू वैज्ञानिक हो गई। रिश्तेदार कहने लगे कि यही ठीक है, लेकिन मैं पापा के सपने को जीती रही थी। नौकरी करते हुए सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की। आखिर पीपीएस में सलेक्शन हुआ। मंजिल मिली।- मनीषा सिंह स्टाफ ऑफिसर एडीजी जोन
...तो पहली बार लगा था डर
मनीषा सिंह ने बताया कि मैंने पीसीएस की परीक्षा 2001 में दी थी। परिणाम 2003 में आया। इस बीच शादी हो गई। बेटा भी हो गया। परिवार के लोग कहने लगे कि पुलिस की नौकरी के चक्कर में न पड़ो क्योंकि गृहस्थी भी तो संभालनी है। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद जब ड्यूटी पर पहली बार आई तो डर रही थी।
अधिकारियों के सामने जाने से पहले सभी संभावित सवालों के जवाब सोचकर जाती थी। वारदात हो जाने पर देर रात तक काम करना पड़ता था। यह बेहद चुनौती भरा था, क्योंकि बच्चे की देखभाल भी जरूरी थी। सबसे बड़ी चुनौती पारिवारिक दायित्वों और ड्यूटी के बीच तालमेल बिठाने की आई। लगातार काम करने का नतीजा है कि सफलता मिल गई।
नमृता श्रीवास्तव क्षेत्राधिकारी (सीओ) हैं। उन्होंने बताया कि मेरे पिता पीसीएस अधिकारी थे। 11वीं की पढ़ाई कर रही थी, तब उनकी मौत हो गई। मां ने नौकरी की। मैं पिता की तरह अफसर बनना चाहती थी। मां ने रास्ता दिखाया, मंजिल मिल गई। मास्टर डिग्री के बाद कोचिंग के लिए मां ने दिल्ली भेजा। 2005 बैच में चयन हो गया था। इससे पहले बीडीओ में चयन हो गया था। छह महीने बाद पुलिस में आईं।
मैडम! आप कहां अधिकारी बनने चली आईं
नमृता श्रीवास्तव ने कहा कि मैंने पुलिस की नौकरी ज्वाइन की तो एक के बाद एक चुनौतियां आती चली गईं। हर कदम पर खुद को औरों से बेहतर साबित करना पड़ा। शुरू में ऐसे कमेंट भी सुनने पड़े, आप कहां पुलिस में अधिकारी बनने चलीं आईं। तब लगा, कोई गलती तो नहीं कर दी। मगर, इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। वरिष्ठ अधिकारी क्राइम कंट्रोल के लिए पहले पुरुष अधिकारियों को तवज्जो देते हैं। इस पर खुद को साबित करने की चुनौती रहती है। अपराध और अपराधियों को कंट्रोल करने पर फोकस किया, सबका भरोसा जीता।
डाक विभाग छोड़कर पुलिस में आई
अलका सिंह महिला थाने की एसएचओ हैं। वो मूलरूप से संभल, मुरादाबाद की रहने वाली हैं। उन्होंने बताया कि पिता उत्तराखंड के चमौली जिले में पीडब्ल्यूडी में नौकरी करते थे। शिक्षा वहीं पाई। वो उड़ान सीरियल देखते थे। इसमें आईपीएस किरण बेदी की कहानी को दिखाया गया था। उस समय मैं डाक विभाग में नौकरी कर रही थी।
पिता ने कहा कि बेटा नौकरी तो पुलिस की है, मेरा सपना है तू पुलिस ऑफिसर बने। मैंने तैयारी शुरू कर दी। रिश्तेदार कहते कि अच्छीभली नौकरी है, क्यों और किसी चक्कर में पड़ती है लेकिन पापा का सपना पूरा करना था। 1991 में पुलिस में नौकरी निकली। जिले में पहली महिला थी जिसने पुलिस की परीक्षा पास की। 1996 में इंटरव्यू और वर्ष 1998 में भर्ती हुई।
परिवार मेडिकल टेस्ट पर ले जाने को नहीं था तैयार
अलका सिंह ने बताया कि पिता की मौत के एक साल बाद नियुक्ति पत्र आया। उनकी अंतिम इच्छा समझकर पुलिस की नौकरी कर ली लेकिन परिवार में कोई इस नौकरी को सही नहीं मान रहा था। परिजन मेडिकल परीक्षण में ले जाने के लिए भी तैयार नहीं थे। बाद में किसी तरह उन्हें समझाया। मैं उस इलाके से थी, जहां से लड़कियां काफी कम बाहर पढ़ने और नौकरी के लिए जाती थीं। विभाग में आने पर काम करने में दिक्कत आती थी। डर लगता था कि कैसे बाहर निकल पाएंगे। देर रात तक ड्यूटी कैसे देंगे। मगर, चुनौतियों का सामना करते हुए सब सीख लिया। कई थानों में प्रभारी बनकर रही हूं।
दमयंती थाना हरीपर्वत में एसआई पद पर तैनात हैं। वो मूलरूप से कानपुर देहात के पुखराया की रहने वाली हैं। उन्होंने बताया कि नौकरी लगने से पहले मेरी शादी हो चुकी थी। ससुराल में ज्यादा बाहर नहीं जा सकते थे। इसके बावजूद दौड़ की तैयारी की। परिवार ने साथ दिया, लेकिन दूसरे मना करते थे। इस बीच रेलवे टीसी की नौकरी की। दो भाई पुलिस में हैं। इसके बावजूद वह कहते कि पुलिस में क्या करोगी। मैंने भाइयों को समझाया। परीक्षा दी, पास हुई और टीसी की नौकरी छोड़कर पुलिस में आई।
दिन में ड्यूटी, रातभर बेटे को संभालती थीं
दमयंती ने कहा कि पुलिस में दरोगा हो गई, शादी हो चुकी थी, बेटा भी हो गया था। दिनभर ड्यूटी का तनाव। रात को घर जाओ तो बेटे को संभालो। उसे नींद न आए तो खुद भी जागो। और फिर सुबह ड्यूटी पर समय से पहुंचना। हमेशा यह डर रहता था कि कोई यह न कह दे कि तुम महिला हो, पुलिस की नौकरी तुम से नहीं होगी। इसी डर में हमेशा खुद को बेहतर साबित करने में लगी रही। पुलिस में अच्छे अधिकारी भी बहुत हैं। खुशनसीबी से मुझे अच्छे ही मिले। उन्होंने काम भी सिखाया और हौसला भी दिया।