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अपराजिताः महिला पहलवानों के सामने आई चुनौतियां अपार, फिर भी नहीं मानी हार, ऐसी है इनकी सफलता की कहानी

Fri, 04 Sep 2020 08:56 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Fri, 04 Sep 2020 08:56 AM IST
सार

पहलवानी का इरादा था लेकिन पता नहीं था कि इसके लिए क्या करना होता है। जानकारों ने बताया कि बदन कठोर होना चाहिए। इसके लिए प्रशिक्षण की जरूरत थी लेकिन पैसे नहीं थे। इसलिए खेतों में मेहनत की और खुद को पहलवानी के लिए तैयार किया। इसके बाद उतर गई अखाड़े में। 

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Aparajita 100 Million Smiles Success Story Of Female wrestler
अपराजिताः महिला पहलवान - फोटो : अमर उजाला
आमिर खान की फिल्म दंगल में फोगाट बहनों के संघर्ष की कहानी आपने देखी होगी। आगरा की महिला पहलवानों के सामने भी चुनौतियां कुछ कम नहीं आईं। किसी को अभ्यास के लिए 30 किमी. पैदल चलना पड़ता था तो किसी के पास कोचिंग के लिए पैसे नहीं थे लेकिन जिंदगी के दंगल में इन्होंने हौसले के दम पर मुसीबतों से कुश्ती जीत ली। इन अपराजिताओं ने अपने दम पर पहचान बनाई।
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सोनिया, महुअर - फोटो : अमर उजाला
थककर चूर हो जाती, पर अभ्यास नहीं छोड़ा
पहलवान बनने का जुनून था। मां-बाप ने सहयोग किया लेकिन सिर्फ इतना काफी नहीं था। स्टेडियम घर से 30 किमी. दूर था और जाने के लिए घर में कोई साधन नहीं था। हिम्मत नहीं हारी...एक दिन पैदल ही चल दी। इसके बाद तो यह सिलसिला बन गया। कोई साधन मिला तो ठीक वरना पैदल ही जाती। सर्दियों में घने कोहरे में सड़क किनारे दौड़ लगाते हुए स्टेडियम पहुंचती, पसीने से तरबतर थककर चूर हो जाती थी लेकिन अभ्यास जारी रखा। जूनियर स्टेट में स्वर्ण,  सीनियर स्टेट में दो स्वर्ण, अंडर-23 स्टेट में स्वर्ण और नेशनल में कांस्य पदक जीत चुकी हूं। सपना ओलंपिक में पदक जीतने का है। - सोनिया, महुअर 
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पूजा बघेल, तेहरा - फोटो : अमर उजाला
खेतों में किया काम, तब बनी पहलवान
पहलवानी का इरादा था लेकिन पता नहीं था कि इसके लिए क्या करना होता है। जानकारों ने बताया कि बदन कठोर होना चाहिए। इसके लिए प्रशिक्षण की जरूरत थी लेकिन पैसे नहीं थे। इसलिए खेतों में मेहनत की और खुद को पहलवानी के लिए तैयार किया। इसके बाद उतर गई अखाड़े में। 2009 में कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लिया। धीरे-धीरे सीख गई और पदक जीतने लगी। रांची में राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता, मैसूर में ऑल इंडिया कुश्ती प्रतियोगिता, हरियाणा में राष्ट्रीय प्रतियोगिता, गोंडा में कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लिया। राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वर्ण सहित दो पदक जीते। ब्रज केसरी भी बनी। - पूजा बघेल, तेहरा

 
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भारती बघेल, तेहरा - फोटो : अमर उजाला
ट्रेन से फेंक दिया बैग, छिपा दिया था पासपोर्ट
कुश्ती खेलने से पहले ही नहीं बाद में भी चुनौतियां आईं। जब अच्छा खेलने लगी तो बेईमानी का शिकार हुई। साथियों ने मेरा पासपोर्ट छिपा दिया था ताकि मैं खेलने के लिए बाहर न जा पाऊं। और क्या कहूं, ट्रेन से मेरा बैग फेंक दिया गया। लेकिन हिम्मत रखी और आगे बढ़ती गई। लखनऊ के साईं हॉस्टल में रहकर प्रशिक्षण प्राप्त किया। जूनियर एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप (यूरोप) में चौथा स्थान था। तीन साल लगातार खेलो इंडिया में स्वर्ण जीता। अंडर-23 में राष्ट्रीय प्रतियोगिता (महाराष्ट्र) में कांस्य मिला। नेशनल सीनियर और अखिल भारतीय विश्वविद्यालय में द्वितीय स्थान रहा। 2018 में भारत केसरी का खिताब जीता। 2017 में ब्रज केसरी और 2014 में यूपी केसरी का खिताब मिल चुका है। कंधे का ऑपरेशन होने की वजह से इन दिनों घर पर हूं।  - भारती बघेल, तेहरा
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पूनम सोलंकी, सहारा - फोटो : अमर उजाला
 गांव वालों ने कर दिया था निमंत्रण देना बंद
मैं एक ही बार में सात सौ दंड-बैठक लगा लेती हूं। सपना कुश्ती में करियर बनाने का था। पहलवानी शुरू की तो गांव के कुछ लोगों ने विरोध किया। वे नहीं चाहते थे कि लड़की दंगल में उतरे। मुझसे कहते थे कि तुम लड़कों की नकल करती हो, इससे लड़का नहीं बन जाओगी। मैंने हार नहीं मानी और वे लोग भी मानने वाले नहीं थे। विरोध शुरू कर दिया। परिवार को शादी ब्याह में बुलाना बंद कर दिया। संघर्ष जारी रखा, मेहनत रंग लाई। राज्य स्तर की कुश्ती में तीन स्वर्ण पदक अपने नाम किए। पटना में चैंपियनशिप में सब जूनियर वर्ग में पदक जीता। कोटा में नेशनल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इन दिनों भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष ब्रजभूषण सरन सिंह के अखाड़े में प्रशिक्षण ले रही हूं। - पूनम सोलंकी, सहारा
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