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अपराजिता: 'आधी आबादी' के हक में उठा रहीं आवाज, पढ़ें इन महिलाओं के जज्बे और हौसले की कहानी

Fri, 21 Aug 2020 12:55 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Fri, 21 Aug 2020 12:55 AM IST
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Aparajita 100 Million Smiles struggle story of Women Social Workers
आगरा की महिला समाजसेवी - फोटो : अमर उजाला
अमर उजाला के अपराजिता अभियान में आज रूबरू होते हैं उन महिलाओं से, जो आधी आबादी के हक की आवाज उठा रही हैं। महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और उनके हक के लिए एनजीओ (गैर सरकारी संगठन) बनाया है या उससे जुड़कर न केवल मुहिम चला रही हैं, बल्कि दूसरों के लिए मिसाल भी कायम कर रही हैं। दूसरी महिलाओं का दर्द समझकर उनको हौसला देना, उनका आत्मविश्वास बढ़ाना और अपने पैरों पर खड़े होने का जज्बा देने की इस मुहिम में मुश्किलें कई हैं। धमकी मिलती हैं, अपशब्द कहे जाते हैं लेकिन हिम्मत नहीं टूटती।
Aparajita 100 Million Smiles struggle story of Women Social Workers
शीतल अग्रवाल - फोटो : अमर उजाला
आरोपी पक्ष के लोग देते थे धमकी- शीला बहल, महिला शांति सेना

शीला बहल ने महिला शांति सेना बनाई है। वो बताती हैं कि 1994 से लॉर्ड कृष्णा समिति से जुड़कर बेटियों की शिक्षा के लिए काम शुरू किया। 2005 में महिला शांति सेना बनाई। महिलाओं और बेटियों की सुरक्षा और उन्हें न्याय दिलाने के लिए काम शुरू किया। 33 बेटियों को न्याय दिलवा चुकी हूं। शुरुआती दिनों में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। आरोपी पक्ष के लोग फोन करके धमकियां देते। अक्सर देर रात को किसी पीड़िता का फोन आता, मौके पर जाती थी। 2008 से 2014 तक परिवार परामर्श केंद्र की प्रभारी रही। कई परिवारों को टूटने से बचाया।
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समाजसेवी सुमन सुराना - फोटो : अमर उजाला
अपशब्द सुने, लेकिन हार नहीं मानी- सुमन सुराना, हेल्पिंग हैंड फाउंडेशन

हेल्पिंग हैंड फाउंडेशन चलाने वाली सुमन सुराना ने बताया कि 15 साल पहले इनर व्हील क्लब आगरा मिड टाउन से जुड़कर काम शुरू किया। महिलाओं के स्वास्थ्य और सफाई की मुहिम शुरू की। दो साल पहले हेल्पिंग हैंड फाउंडेशन खोला। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया। कई बार अपशब्द सुनने पड़े, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। संगठन में करीब 30 चिकित्सकों को जोड़ा। बालिकाओं को जागरूक करने के लिए शिविर लगाए, सैनेटरी नेपकिन बांटकर उपयोगिता समझाई। लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई, कढ़ाई, मेहंदी की क्लास शुरू कराई। 
 
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समाजसेवी शीतल अग्रवाल - फोटो : अमर उजाला
आवाज उठाई तो सुनने पड़े ताने- शीतल अग्रवाल, ऑल स्कूल वेलफेयर एसोसिएशन

शीतल अग्रवाल महिलाओं के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि निजी साफ-सफाई रखने से विशेष दिनों में बीमारियों से बचा जा सकता है। जब मैंने इस मुद्दे को उठाया तो लोगों के ताने सुनने पड़े। कुछ प्रतिष्ठित लोगों ने कहा कि मैं सस्ती लोकप्रियता के लिए यह सब कर रही हूं। तीन साल पहले एक कॉलेज में प्रिसिंपल बनी तो बेटियों की समस्या को और समझा। महिलाओं की ‘स्वास्थ्य एवं सुरक्षा’ के लिए काम करने का निश्चय किया। ऑल स्कूल वेलफेयर एसोसिएशन (असवा) के कोषाध्यक्ष पवन अग्रवाल ने मदद की। रुनकता के पास पहली बार शिविर लगाया तो ग्रामीणों ने दुत्कारा। अब सोच बदल रही है।
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समाजसेवी ममता गोयल - फोटो : अमर उजाला
बेटियों को स्कूल में पहुंचाया- ममता गोयल, हेल्प बॉक्स

ममता गोयल ने छह साल पहले ‘हेल्प बॉक्स’ नाम से फाउंडेशन शुरू किया। इससे सात सदस्य जुडे़ हैं। स्कूल को गोद लेकर वहां पढ़ने वाले बच्चों का खर्चा उठाते हैं। 50 बच्चियों की शिक्षा का दायित्व है। शिक्षा के साथ उनको हाथ का हुनर भी सिखा रहे हैं। ममता गोयल ने बताया कि शुरुआत में बहुत मुश्किल आई। अधिकांश बच्चियां बस्तियों से हैं। माता-पिता मजदूरी या जूते की फैक्टरी में काम करते। बच्चियों का दाखिला तो करा देते लेकिन स्कूल में भेजते नहीं। बच्चियों को स्कूल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उठाई। ताने मिले, हर रोज बैग टांगकर पता नहीं कहां जाती हूं...। लेकिन मैंने किसी की नहीं सुनी। 
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