अखाड़े में ताल ठोक कर ललकारती महिला पहलवान। मैदान के बाहर ढोल मंजीरों के साथ हौसला बढ़ाती 14 गांवों से आई महिलाओं का समूह। उधर, अखाड़े में किसी ने पैर फंसाकर प्रतिद्वंद्वी को चित किया तो किसी ने कुछ ही सेकंड में पटखनी देकर बाजी अपने नाम कर ली।
दांव-पेच के साथ जीत हासिल का जज्बा और इसके लिए की गई जोर आजमाइश देख पूरा अखाड़ा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। यह नजारा था गोसाईगंज के छोटे से गांव अहिमामऊ में 200 साल पुराने महिलाओं के दंगल ‘हापा’ का, जहां सैकड़ों साल से देवी शक्ति में अखंड विश्वास रखने वाला यह गांव रविवार नारी सशक्तीकरण का गवाह बना।
दंगल की शुरुआत ढोल-नगाड़े के बीच देवी गीत से की गई। दंगल का पहला मुकाबला 40 वर्षों से जीत हासिल कर रही बुजुर्ग विनय कुमारी व 75 बसंत पार कर चुकी बुजुर्ग महिला तुलसा देवी के बीच हुआ। अखाड़े में 70 साल की अपराजेय विनय कुमारी ताल ठोक कर चुनौती दे रहीं थीं तो तुलसा देवी भी ललकार रही थी। मैदान के आसपास का माहौल जोश से भरा था।
विनय कुमारी ने महज कुछ सेकंड में ही तुलसा देवी के पैर में पैर फंसा कर जमीन पर चित कर दिया। महिलाओं का यह 200 साल पुराना दंगल देखने 14 गांवों से आईं महिलाएं नजारा देख उछल गईं। ‘हापा’ में महिला पहलवानों का उत्साह बढ़ाने के लिए बाराबंकी, सीतापुर समेत कई जनपदों से भी बड़ी संख्या में महिलाएं पहुंची थीं।
न कोई तकनीक न नियम, बिना गुरु ही सीखती हैं सारे पैतरे
तकनीक की बात की जाए, तो यहां कुश्ती के किसी भी नियम का पालन नहीं होता है। बस, जिसने पहले प्रतिद्वंद्वी की पीठ को मिट्टी से छुआ दिया, वहीं विजेता कहलाया। इस गांव की खासियत यह है कि बीते दो सौ साल से जारी इस दंगल को सिखाने के लिए कोई गुरु नहीं होता। यहां की महिलाएं दंगल के दांव-पेच अपनी अजिया सास, सास व अन्य बुजुर्गों से ही सीखती हैं, लेकिन यह पैंतरे इतने सटीक होते हैं कि गांव की 70 से 75 साल की बुजुर्ग महिलाओं के सामने कोई भी प्रतिद्वंद्वी ज्यादा देर नहीं टिकता।