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साक्षरता दिवस: जरूरतमंद बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रहा संघर्ष विद्या केंद्र, पढ़ें कैसे शुरू हुआ सफर

Thu, 08 Sep 2022 10:05 AM IST
kumar गुलशन कुमार अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: kumar गुलशन कुमार Updated Thu, 08 Sep 2022 10:05 AM IST
सार

समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से दुनिया भर में 8 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है। इस साक्षरता दिवस पर जानते हैं एक अनोखे जम्मू के स्कूल की कहानी, यहां जरुरतंद बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जा रही है।

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Sangharsh Vidya Kendra maratha basti jammu awakening light of education among needy children
संघर्ष विद्या केंद्र में पढ़ रहे विद्यार्थी - फोटो : संजय गुप्ता

समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से दुनिया भर में 8 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है। इस साक्षरता दिवस पर जानते हैं एक अनोखे जम्मू के स्कूल की कहानी, यहां जरुरतंद बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जा रही है। 



वर्ष 2009 में झुग्गी में शुरू हुआ संघर्ष विद्या केंद्र मराठा बस्ती के बच्चों में साक्षरता की अलख जगा रहा है। इस समय स्कूल में जरूरतमंद परिवारों के 82 विद्यार्थी शिक्षा हासिल कर रहे हैं। पहली से पांचवीं तक के स्कूल में निशुल्क शिक्षा के साथ बच्चों को यूनिफॉर्म, किताबें, पेंसिल, पेन और जरूरत की चीजें उपलब्ध करवाई जा रही हैं। भौर कैंप के हायर सैकेंडरी स्कूल से लैक्चरर रिटायर्ड  कंचन शर्मा ने इस स्कूल की शुरुआत की। 2009 में पहले बैच के बच्चे आज शहर के अलग-अलग स्कूलों से 12वीं कक्षा पास कर चुके हैं।
   

शिक्षिका कंचन शर्मा (62) ने बताया कि 2004 में वह गांधी नगर गर्ल्स हाई स्कूल में तैनात थीं। इस दौरान एक संस्था कुछ बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाने पहुंची। बातचीत के बाद बच्चों को दाखिला दे दिया गया। पता चला कि बच्चे पास के मराठा बस्ती (त्रिकुटा नगर) से आए हैं। उन्हें देखकर उस इलाके में जाने का मन हुआ। वहां जाकर देखा तो कई बच्चे ऐसे थे, जो स्कूल जाने की उम्र के तो थे, लेकिन गरीबी के चलते स्कूल नहीं जा पा रहे थे। इस घटना ने अंदर से झकझोर दिया। इसके बाद उन्होंने बच्चों के लिए कुछ करने की ठानी। शिक्षा से वंचित बच्चों को गांधी नगर स्कूल में बुलाया और दाखिला दिया। 

Sangharsh Vidya Kendra maratha basti jammu awakening light of education among needy children
Jammu - फोटो : अमर उजाला

कैसे शुरू हुआ स्कूल

कंचन शर्मा ने बताया कि 2006 में उनका तबादला बन सुल्तान के सरकारी स्कूल में हो गया। इसके बाद जिन बच्चों को उन्होंने गांधी नगर स्कूल में दाखिल करवाया था, उन्होंने भी स्कूल छोड़ दिया। इन बच्चों की संख्या 40 थी। इससे उन्हें बहुत दुख हुआ। इसके उपरांत वह छुट्टी के बाद मराठा बस्ती में जाकर बच्चों को पढ़ाने लगीं। 

खुले आसामान तले स्कूल लगता था। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। इसके बाद झुग्गी में स्कूल में शिफ्ट किया गया। कंचन शर्मा के मुताबिक इस दौरान वह सर्वशिक्षा अभियान के कार्यालय में चक्कर लगाती रहीं, ताकि मराठा बस्ती में एजुकेशन गारंटी सेंटर खोला जाए। अगर यह सेंटर खुल जाता तो पांच साल बाद इसे राजकीय प्राइमरी स्कूल में बदला जाना था, लेकिन तकनीकी कारणों से ऐसा नहीं हो पाया।

'अगर पढ़ने आता तो इस बस्ती में क्यों रहता'

रविवार के दिन जब अपने स्कूल से छुट्टी मिलती या फिर कोई सरकारी अवकाश होता तो मैं यहां बच्चों को पढ़ाने के लिए पहुंच जाती। एक दिन एक कार्यक्रम के दौरान मराठा बस्ती के वासुदेव को आवाज दी कि वो स्पीकर की आवाज बढ़ाएं और उस पर पढ़ कर। तो वासुदेव ने कहा- अगर पढ़ना आता तो मैं क्या इसी बस्ती में ऐसे रहता। कंचन शर्मा के मुताबिक, इस बात ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया कि इस क्षेत्र में बच्चों को पढ़ाया जाए।

जब बस्ती में बच्ची ने फाड़ दी किताबें

एक बार मराठा बस्ती में एक युवती को करीब 40 किताबें रखने को दीं। अगले दिन उससे किताबें लाने के लिए कहा। इस पर युवती ने बताया कि उसने किताबें फाड़ कर उस पर बैर रख कर बेच दिए। कंचन शर्मा ने कहा कि इस घटना ने गुस्सा लाने के बजाए मन में यह सोच लाई कि यहां पर बच्चों को शिक्षित किया जाना कितना जरूरी है।   

कंचन शर्मा के मुताबिक 2009 में झुग्गी में खुले स्कूल को संघर्ष विद्या केंद्र का नाम दिया गया। 2012 में इस स्कूल को जम्मू-कश्मीर शिक्षा बोर्ड से मान्यता मिल गई। आज इस स्कूल में 82 बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं। कंचन शर्मा आज भी स्कूल के रखरखाव और बाकी जरूरतों को खुद के खर्च से पूरा कर रही हैं।  

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Jammu - फोटो : संजय गुप्ता

'खाना दोगे तो फिर भूख लगेगी, कपड़े फट जाएंगे, पर शिक्षा से सभी जरूरतें पूरी हो सकेंगी'

शिक्षिका कंचन शर्मा ने बताया कि एक सकारात्मक सोच से शुरू हुआ कारवां अब धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, अगर आप किसी बच्चे को खाना दोगे तो उसे फिर भूख लग जाएगी, अगर कपड़े दोगे तो वो फट जाएंगे, लेकिन अगर शिक्षा दोगे तो वह सभी जरूरी चीजें खुद जुटा पाएगा। यह है शिक्षा की शक्ति।

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Jammu - फोटो : अमर उजाला

‘टिकट टू लाइफ’ के लिए नामित हुआ स्कूल

कंचन शर्मा के मुताबिक इस समय स्कूल में उनके अलावा तीन और शिक्षिकाएं पढ़ाती हैं। इनको वेतन भी वह खुद की जेब से दे रही हैं। विद्या केंद्र अब एक अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट ‘टिकट टू लाइफ’ के लिए नामित हुआ है। इसके लिए हाल में कार्यशाला का भी आयोजन किया गया था।

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दादी संग स्कूल से वापस लौट रहा छात्र सन्नी - फोटो : संजय गुप्ता

बच्चों ने कहा- उनका पढ़ाई का सपना पूरा हो रहा
 

बच्चों के माता-पिता बेहतर आर्थिक संभावनाओं की तलाश में पिछले 30 से 40 सालों से महाराष्ट्र के एक गांव पिपरी से मराठा बस्ती में आ बसे थे। ये लोग कूड़ा बीनने का काम करते हैं या भीख मांगने को मजबूर हैं। ऐसे में उनके बच्चों के लिए स्कूल जाना किसी सपने के सच होने जैसा है।
 

 

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