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हौसले की उड़ान, जीत की पहचान : शीतल, आकिब, श्रेया और विशाल ने बढ़ाया मान
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- राष्ट्रीय खेल दिवस : जम्मू-कश्मीर के छोटे गांवों से अंतरराष्ट्रीय मंच तक, किसी ने बिना हाथों के तीर चलाया, किसी ने 150 किमी प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार से दुनिया को चौंकाया
- क्रिकेट, तीरंदाजी और फेंसिंग में संघर्ष की अलग-अलग कहानियां, राष्ट्रीय उपलब्धियों से लेकर एशियाई खेलों तक पहुंचा प्रदेश का खेल सफर
अभिषेक बड़ू
जम्मू। मैदान, खेल और चुनौतियां अलग थीं, लेकिन मंजिल एक... अपनी पहचान बनाना और जम्मू-कश्मीर व देश का नाम रोशन करना। इसी लक्ष्य को लेकर किश्तवाड़ के छोटे से गांव से निकली शीतल देवी ने बिना हाथों के तीरंदाजी में दुनिया को चौंकाया तो बारामुला के आकिब नबी ने सीमित सुविधाओं से निकलकर भारतीय टेस्ट टीम तक का सफर तय किया। दूसरी ओर श्रेया गुप्ता और विशाल थापर ने तलवारबाजी में वर्षों की मेहनत व संघर्ष के बाद देश के लिए पदक जीते।
ये कुछ उदाहरण जम्मू-कश्मीर के ऐसे खिलाड़ी के हैं जिन्होंने अपनी पहचान बनाई है। इन खिलाड़ियों की कहानियां सिर्फ उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि उस हौसले की मिसाल हैं जिसने मुश्किल परिस्थितियों को पीछे छोड़कर जम्मू-कश्मीर को खेल के नक्शे पर नई पहचान दी।
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शीतल देवी : पैरों से साधा निशाना, दुनिया में बनाई पहचान
किश्तवाड़ के एक छोटे से गांव से निकलकर शीतल देवी ने तीरंदाजी में वह कर दिखाया जिसकी कल्पना भी आसान नहीं थी। दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद उन्होंने पैरों, कंधे और जबड़े की मदद से धनुष चलाना सीखा। लगातार अभ्यास और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा साबित की। 2023 एशियन पैरा गेम्स में स्वर्ण, पेरिस पैरालंपिक में कांस्य और 2025 विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर शीतल ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी उपलब्धियां अब जम्मू-कश्मीर के खेल इतिहास का हिस्सा हैं। 27 अगस्त को खेलो इंडिया संवाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी उपलब्धियों की सराहना की।
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आकिब नबी : सीमित सुविधाओं से टेस्ट टीम तक
बारामूला के आकिब नबी की कहानी भी संघर्ष से सफलता तक पहुंचने की है। सीमित सुविधाओं के बीच क्रिकेट शुरू करने वाले आकिब बेहतर अभ्यास के लिए श्रीनगर तक जाते रहे। घरेलू क्रिकेट में लगातार प्रभावी प्रदर्शन ने उनकी पहचान मजबूत की। दिलीप ट्रॉफी में चार गेंदों पर चार विकेट लेने के प्रदर्शन ने उन्हें खास चर्चा दिलाई। इसके बाद लगातार दो बेहतरीन रणजी सत्रों में उन्होंने अपनी गेंदबाजी का दम दिखाया। 2025-26 सत्र में 60 विकेट लेने और जम्मू-कश्मीर को रणजी ट्रॉफी का खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाने के बाद उनका सफर आईपीएल तक पहुंचा। अब भारतीय टेस्ट टीम में उनका चयन जम्मू-कश्मीर क्रिकेट के लिए बड़ी उपलब्धि बन गया है।
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श्रेया गुप्ता : ताइक्वांडो से फेंसिंग तक का सफर
श्रेया गुप्ता का चयन फेंसिंग में एशियन गेम्स के लिए हुआ है। वह भारतीय टीम का हिस्सा होगा। 2013 में ताइक्वांडो छोड़कर फेंसिंग को अपना खेल बनाया। भाई से मिली प्रेरणा के बाद उन्होंने इस खेल में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। अंडर-14 से लेकर सीनियर स्तर तक राष्ट्रीय चैंपियन बनने वाली श्रेया ने कम समय में अपनी अलग पहचान बनाई। 2017 में एक ही राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चार पदक जीतकर वह सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनीं। वर्षों की मेहनत का सिलसिला आगे भी जारी रहा। अगस्त 2026 में कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने के बाद अब उनकी नजर सितंबर में जापान में होने वाले एशियाई खेलों पर है, जहां वह भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी।
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विशाल थापर : दो दशक की मेहनत का एशियाई खेलों तक पहुंचा सफर
वर्ष 2006 में फेंसिंग शुरू करने वाले विशाल थापर का सफर करीब दो दशक की मेहनत, चोट और चुनौती से भरा रहा। कई मुश्किलों के बावजूद उन्होंने फेंसिंग नहीं छोड़ी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 50 से अधिक पदक जीते। अब वह 2026 एशियाई खेलों के लिए भारतीय टीम का हिस्सा हैं। विशाल के लिए यह सिर्फ एक प्रतियोगिता में जगह बनाना नहीं, बल्कि वर्षों से देखे जा रहे सपने का पूरा होना है। उनका मानना है कि यह उपलब्धि लंबे संघर्ष और अपने लक्ष्य पर विश्वास बनाए रखने का परिणाम है।
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- क्रिकेट, तीरंदाजी और फेंसिंग में संघर्ष की अलग-अलग कहानियां, राष्ट्रीय उपलब्धियों से लेकर एशियाई खेलों तक पहुंचा प्रदेश का खेल सफर
अभिषेक बड़ू
जम्मू। मैदान, खेल और चुनौतियां अलग थीं, लेकिन मंजिल एक... अपनी पहचान बनाना और जम्मू-कश्मीर व देश का नाम रोशन करना। इसी लक्ष्य को लेकर किश्तवाड़ के छोटे से गांव से निकली शीतल देवी ने बिना हाथों के तीरंदाजी में दुनिया को चौंकाया तो बारामुला के आकिब नबी ने सीमित सुविधाओं से निकलकर भारतीय टेस्ट टीम तक का सफर तय किया। दूसरी ओर श्रेया गुप्ता और विशाल थापर ने तलवारबाजी में वर्षों की मेहनत व संघर्ष के बाद देश के लिए पदक जीते।
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ये कुछ उदाहरण जम्मू-कश्मीर के ऐसे खिलाड़ी के हैं जिन्होंने अपनी पहचान बनाई है। इन खिलाड़ियों की कहानियां सिर्फ उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि उस हौसले की मिसाल हैं जिसने मुश्किल परिस्थितियों को पीछे छोड़कर जम्मू-कश्मीर को खेल के नक्शे पर नई पहचान दी।
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शीतल देवी : पैरों से साधा निशाना, दुनिया में बनाई पहचान
किश्तवाड़ के एक छोटे से गांव से निकलकर शीतल देवी ने तीरंदाजी में वह कर दिखाया जिसकी कल्पना भी आसान नहीं थी। दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद उन्होंने पैरों, कंधे और जबड़े की मदद से धनुष चलाना सीखा। लगातार अभ्यास और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा साबित की। 2023 एशियन पैरा गेम्स में स्वर्ण, पेरिस पैरालंपिक में कांस्य और 2025 विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर शीतल ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी उपलब्धियां अब जम्मू-कश्मीर के खेल इतिहास का हिस्सा हैं। 27 अगस्त को खेलो इंडिया संवाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी उपलब्धियों की सराहना की।
आकिब नबी : सीमित सुविधाओं से टेस्ट टीम तक
बारामूला के आकिब नबी की कहानी भी संघर्ष से सफलता तक पहुंचने की है। सीमित सुविधाओं के बीच क्रिकेट शुरू करने वाले आकिब बेहतर अभ्यास के लिए श्रीनगर तक जाते रहे। घरेलू क्रिकेट में लगातार प्रभावी प्रदर्शन ने उनकी पहचान मजबूत की। दिलीप ट्रॉफी में चार गेंदों पर चार विकेट लेने के प्रदर्शन ने उन्हें खास चर्चा दिलाई। इसके बाद लगातार दो बेहतरीन रणजी सत्रों में उन्होंने अपनी गेंदबाजी का दम दिखाया। 2025-26 सत्र में 60 विकेट लेने और जम्मू-कश्मीर को रणजी ट्रॉफी का खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाने के बाद उनका सफर आईपीएल तक पहुंचा। अब भारतीय टेस्ट टीम में उनका चयन जम्मू-कश्मीर क्रिकेट के लिए बड़ी उपलब्धि बन गया है।
श्रेया गुप्ता : ताइक्वांडो से फेंसिंग तक का सफर
श्रेया गुप्ता का चयन फेंसिंग में एशियन गेम्स के लिए हुआ है। वह भारतीय टीम का हिस्सा होगा। 2013 में ताइक्वांडो छोड़कर फेंसिंग को अपना खेल बनाया। भाई से मिली प्रेरणा के बाद उन्होंने इस खेल में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। अंडर-14 से लेकर सीनियर स्तर तक राष्ट्रीय चैंपियन बनने वाली श्रेया ने कम समय में अपनी अलग पहचान बनाई। 2017 में एक ही राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चार पदक जीतकर वह सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनीं। वर्षों की मेहनत का सिलसिला आगे भी जारी रहा। अगस्त 2026 में कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने के बाद अब उनकी नजर सितंबर में जापान में होने वाले एशियाई खेलों पर है, जहां वह भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी।
विशाल थापर : दो दशक की मेहनत का एशियाई खेलों तक पहुंचा सफर
वर्ष 2006 में फेंसिंग शुरू करने वाले विशाल थापर का सफर करीब दो दशक की मेहनत, चोट और चुनौती से भरा रहा। कई मुश्किलों के बावजूद उन्होंने फेंसिंग नहीं छोड़ी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 50 से अधिक पदक जीते। अब वह 2026 एशियाई खेलों के लिए भारतीय टीम का हिस्सा हैं। विशाल के लिए यह सिर्फ एक प्रतियोगिता में जगह बनाना नहीं, बल्कि वर्षों से देखे जा रहे सपने का पूरा होना है। उनका मानना है कि यह उपलब्धि लंबे संघर्ष और अपने लक्ष्य पर विश्वास बनाए रखने का परिणाम है।