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Kashmir Files: सरेबाजार भाई को गोलियों से छलनी कर लस्सी पीता रहा बिट्टा कराटे और उसके आतंकी

अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: kumar गुलशन कुमार Updated Sat, 13 Aug 2022 03:36 PM IST
कश्मीर पंडित मक्खन लाल काजी।
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वो शिवरात्रि का दिन था। कश्मीर में हालात बहुत खराब थे। मेरा छोटा भाई बाजार गया था। आतंकी बिट्टा कराटे ने दूसरे आतंकियों के साथ मिलकर मेरे भाई पर तीन गोलियां चलाईं। वह जमीन पर गिर गया और तड़पता रहा। कोई भी उसकी मदद करने नहीं आया। लोग खिड़कियों से देखते रहे। आतंकी पास की दुकान पर लस्सी पीते रहे। जब उन्होंने देखा कि वो अभी भी जिंदा है, तो उसके पास गए और उसे लातों से मारा। फिर उस पर गोलियां चलाईं, जब तक उसने दम न तोड़ दिया। इसके बाद छोटे भाई के शव को पास के नाले में फेंक कर चले गए। यह आपबीती जम्मू के भगवती नगर में रह रहे 75 वर्षीय मक्खन लाल काजी ने बताईं।

1990 के समय मक्खन लाल काजी का परिवार श्रीनगर के हब्बा कदल इलाके में रहता था। कश्मीर की फिजा में तब सांप्रदायिकता की आग फैल चुकी थी। उनके छोटे भाई अशोक काजी (35) बागवानी विभाग में कार्यरत थे। वह हिंदू सभा के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता थे। मक्खन काजी बताते हैं कि शिवरात्रि के दिन 20 फरवरी 1990 को उनका भाई अशोक काजी किसी काम से बाजार गया था। आतंकियों ने हमला कर उसका कत्ल कर दिया। तब लोगों में खौफ का आलम यह था कि उनके घर पर अफसोस जताने तो दूर भाई के अंतिम संस्कार के लिए भी कोई नहीं आया।
फाइल फोटो: बिट्टा कराटे
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दो बार जलानी पड़ी चिता
मक्खन लाल काजी कहते हैं कि तब वह जम्मू में थे। परिवार के सदस्य भाई को श्मशान ले गए। हमले के डर से जल्दी से चिता को आग लगाकर सभी घर वापस आ गए। लेकिन, बारिश के चलते चिता बुझ गई। घटना की जानकारी मिलने पर वह किसी तरह श्रीनगर पहुंचे। अगले दिन कुछ पुलिसकर्मियों को साथ ले कर मक्खन लाल काजी शमशान भूमि पर पहुंचे। उन्होंने फिर वहां अधजले भाई के शव को अग्नि देकर उनका दाह संस्कार किया।
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Kashmiri Pandit
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रिश्तेदार भी नहीं पहुंचते थे घर
मक्खन काजी ने कहा कि उस वक्त हालात इतने ज्यादा खराब थे कि डर के मारे रिश्तेदार भी किसी के घर नहीं पहुंचते थे। सब को अपनी जान की फिक्र थी। ऐसी कई दर्द भरी घटनाएं उन्हें उस समय अक्सर सुनने को मिलती थीं। आतंकी कभी किसी कश्मीरी पंडित को मार देते थे, तो कभी किसी कश्मीरी पंडित महिला पर अत्याचार कर उसका कत्ल कर देते थे। इन हालातों के बीच उनका परिवार अपना घर और संपत्ति छोड़कर जम्मू आ गया। 
Kashmiri Pandits Displacement 19 January 1990
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सबसे पहले बोलने वाले लोगों को बनाया निशाना
उन्होंने बताया कि कहा जा सकता है कि मेरे भाई का कसूर बस इतना था कि वो अपने समाज को लेकर चिंतित रहता था। वो आवाज उठाता था। वह अपने लोगों के लिए सजग रहता था। आतंकियों ने सबसे पहले बोलने वाले लोगों को निशाना बनाया, ताकि डर का माहौल बनाया जा सके और कोई भी उनके खिलाफ न बोले।
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1990 Massacre of Kashmiri Pandits
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हत्या का कोई मामला दर्ज नहीं हुआ
आगे उन्होंने बताया कि आज तक इंसाफ मिलना तो दूर उनके भाई की हत्या का कहीं कोई मामला भी दर्ज नहीं हुआ। जिन्होंने कश्मीरी पंडितों पर जुल्म किए वो आज भी आजाद घूम रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी बस इतनी मांग है कि सरकार दोषियों को सजा दे। कम से कम उन्हें पकड़ कर जेल में तो बंद करे। 
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