जम्मू-कश्मीर में आज ईद-उल-फितर का पर्व मनाया जा रहा है। वहीं जम्मू-कश्मीर की प्रसिद्ध और बड़ी मस्जिदों में सन्नाटा पसरा हुआ है। ऐसा पहली बार हुआ समुदाय के लोग ईद-उल-फितर की नमाज मस्जिदों में अता न पाए। लोगों ने आज के दिन एक अनूठी और सदियों तक याद रखी जाने वाली मिसाल भी पेश की है। कोरोना वायरस के संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए इस बार घरों में लोगों ने ईद की नमाज की।
तस्वीरेंः कोरोना से जंग में 2020 की ईद इतिहास में दर्ज हो गई, अल्लाह के बंदों ने पेश की अनूठी मिसाल
इस्लाम में रमजान को सबसे मुकद्दस और पाक माह माना गया है। इस माह में एक माह तक रोजा रखकर अल्लाह की इबादत की जाती है। रोजे पूरा करने के बाद अल्लाह अपने बंदों को ईद-उल-फितर का तोहफा देता है। इस दिन मुसलमान घरों में मीठे पकवान खासतौर पर सेवई बनाते हैं। एक-दूसरे को ईद की मुबारकबाद देते हैं। आपस के गिले शिकवे भी दूर करते हैं। यह त्योहार भाईचारे का संदेश भी देता है।
ईद-उल-फितर के दिन मुसलमान नए कपड़े पहनकर बच्चों के साथ नमाज अता कर अपने और परिवार के अलावा बुजुर्गों, वालिदैन के लिए दुआएं करने के साथ अमन और चैन की दुआ करते हैं। इस दिन पढ़ी जाने वाली पहली नमाज को सलात अल फज्र कहा जाता है। ईद से पहले हर मुसलमान के लिए फितरा देना फर्ज है। फितरे के तहत प्रति इंसान पौने दो किलो अनाज या उसकी कीमत (तकरीबन 55 रुपये) गरीबों को दी जाती है।
ये इसलिए होता है, ताकि गरीब भी ईद की खुशी मना सकें। कहते हैं कि पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने बद्र के युद्ध में फतह हासिल की थी। इस युद्ध में फतह मिलने की खुशी में लोगों ने यह त्योहार मनाना शुरू किया। पवित्र कुरान पाक के मुताबिक मुकद्दस रमजान माह में रोजे रखने के बाद अल्लाह इस दिन अपने बंदों को बख्शीश और इनाम देते हैं। इसीलिए इस दिन को ईद कहते हैं। मुसलमान ईद में खुदा का शुक्रिया अदा करते हैं।
आज की रात यानी कि ईद-उल-फितर की रात इनाम वाली रात है। रमजान मुबारक के एखतमाम पर आने वाली शब बहुत बरकत और अहम तरीन रात है, जिसे हदीश में लैलतुल जायजा कहा गया है। यानी इनाम मिलने वाली रात, क्योंकि इस शब में अल्लाह ताला की जानिब से अपने बंदों को पूरे रमजान की मशकों और कुर्बानियों का बेहतरीन सिला मिलता है।