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जानें, हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कब, कैसे और क्यों लगना शुरू हुआ ग्रहण
अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Sun, 21 Jun 2020 08:28 AM IST
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ग्रहण 2020
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किसी भी तरह के ग्रहण को विज्ञान एक खगोलिय घटना मानता है लेकिन बात अगर हिंदू धर्म में ग्रहण की करें तो ग्रहण हिंदूओं के लिए यह खास महत्व रखता है। हिंदू धर्म में ग्रहण कब, कैसे और क्यों लगना शुरू हुआ इससे जुड़ी एक पौराणिक कथा है। इसी कहानी से दो महत्पूर्ण ग्रहों की उत्पति और ग्रहण को शुरुआत माना गया है।
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surya grahan
ये है ग्रहण से जुड़ी पौराणिक कहानी
जब दैत्यों ने तीनों लोक पर अपना अधिकार जमा लिया था, तब देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद मांगी थी। देवताओं ने तीनों लोक को असुरों से बचाने के लिए भगवान विष्णु का आह्वान किया गया था। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को क्षीर सागर का मंथन करने के लिए कहा और इस मंथन से निकले अमृत का पान करने के लिए कहा।
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Surya Grahan
भगवान विष्णु ने देवताओं को चेताया था कि ध्यान रहे अमृत असुर न पीने पाएं क्योंकि तब इन्हें युद्ध में कभी हराया नहीं जा सकेगा। भगवान के कहे अनुसार देवताओं में क्षीर सागर में मंथन किया। समुद्र मंथन से निकले अमृत को लेकर देवता और असुरों में लड़ाई हुई।
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surya grahan
उस समय भगवान विष्णु ने मोहनी रूप धारण कर एक तरफ देवता और एक तरफ असुरों को बिठा दिया और कहा कि बारी-बारी से सबको अमृत मिलेगा। यह सुनकर एक असुर देवताओं के बीच भेष बदलकर बैठ गया, लेकिन चंद्र और सूर्य उसे पहचान गए और भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दी, लेकिन तब तक भगवान उसको अमृत दे चुके थे। अमृत गले तक पहुंचा था कि भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से असुर के धड़ को सिर से अलग कर दिया, लेकिन तब तक उसने अमृतपान कर लिया था।
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chandra grahan
हालांकि, अमृत गले से नीच नहीं उतरा था, लेकिन उसका सिर अमर हो गया। सिर राहु बना और धड़ केतु के रूप में अमर हो गया। भेद खोलने के कारण ही राहु और केतु की चंद्र और सूर्य से दुश्मनी हो गई। कालांतर में राहु और केतु को चंद्रमा और पृथ्वी की छाया के नीचे स्थान प्राप्त हुआ है। उस समय से राहु और केतु सूर्य एवं चंद्रमा से द्वेष रखते हुए समय-समय पर इनका ग्रास यानि ग्रहण करते हैं। इसी प्रक्रिया को ग्रहण कहा जाता है।
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