पत्नी ने जिद और शिद्दत के साथ महाकुंभ जाने के लिए टिकट बुक कराया था। बच्चों ने कहा था कि मम्मी-पापा ध्यान से जाना और जल्दी घर वापस आना।
मैं तो सुरक्षित घर आ गया, लेकिन पत्नी तारा देवी उस भयावह मंजर में मुझसे बिछड़ गई और अब उसका कोई अता-पता नहीं है।
पुलिस और मीडिया से गुहार है कि कृपया मेरी पत्नी को ढूंढ दें। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर यह बात कहते हुए गुप्तेश्वर की आंखें नम हो गईं और रोने लगे। रविवार सुबह से ही हादसे के बाद लापता लोगों को उनके परिजन तलाशते रहे।
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शत्रुघ्न कुमार
- फोटो : अमर उजाला
'स्टेशन पर बम फट गया है...'
अपने लापता भाई को ढूंढते हुए शत्रुघ्न कुमार ने बताया कि दो-तीन परिजनों के साथ बहन सुचिता कुमारी को शनिवार रात 10:30 बजे स्टेशन पर छोड़कर निकले थे। इसी दौरान सूचना मिली कि भगदड़ मच गई है, स्टेशन पर बम फट गया है, जब देखने आए तो वहां कोई नहीं था। आधी रात एक बजे तक खोजते रहे, लेकिन कोई नहीं मिला। कई कॉल भी की, लेकिन कॉल नहीं लग रही थी। वह मानसिक रूप से विकार है।
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विलाप करते परिजन
- फोटो : पीटीआई
अपना मकान खरीदने जा रहे थे बिहार, हो गए हादसे के शिकार
बिहार के नवादा के रहने वाले राजकुमार मांझी (42) परिवार के साथ नई दिल्ली स्टेशन पहुंचे थे। इनको प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत नवादा पहुंचकर मकान लेना था, लेकिन उससे पहले ही परिवार हादसे का शिकार हो गया। राजकुमार की पत्नी शांति देवी (40) और आठ साल की बेटी पूजा की हादसे में मौत हो गई। रोते हुए राजकुमार ने बताया कि वह झज्जर में रहकर मजदूरी करता था। परिवार में पत्नी शांति के अलावा बेटी पूजा और एक बेटा अविनाश थे।
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विलाप करते परिजन
- फोटो : पीटीआई
इनको बिहार जाना था, इसलिए शनिवार शाम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। स्टेशन पहुंचने पर काफी भीड़ थी। इस बीच भगदड़ मच गई और परिवार इसका शिकार हो गया। हालात बेहतर हुए तो बेटी और पत्नी नहीं मिले। बाद में वह किसी तरह एलएनजेपी अस्पताल पहुंचा। वहां उसे पत्नी और बेटी के शव मिले। राजकुमार ने बताया कि उसका बेटा भी भीड़ में फंसा था, लेकिन किसी ने उसे सुरक्षित निकाल लिया। बाद में वह उसे रेलवे स्टेशन पर मिल गया।
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विलाप करते परिजन
- फोटो : पीटीआई
तीन अस्पतालों ने हुए पोस्टमॉर्टम, सुबह ही परिजनों को सौंपे गए शव
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर शुक्रवार देर रात हुई भगदड़ में जान गंवाने वाले 18 लोगों का पोस्टमॉर्टम दिल्ली के तीन अलग-अलग अस्पतालों में महज कुछ ही घंटों में हो गया। सुबह होते ही डॉक्टरों ने पहले शवों का शिनाख्त की। उसके बाद पोस्टमॉर्टम शुरू हुआ। सामान्य तौर पर एक शव के पोस्टमॉर्टम में करीब एक से डेढ़ घंटे का समय लगता है। भगदड़ में घायल हुए लोगों का इलाज कर रहा लोकनायक अस्पताल दिनभर छावनी में तब्दील रहा। पीड़ितों का हालचाल लेने पहुंचे परिजनों को मिलने में काफी परेशानी हुई। परिजनों ने बताया कि पीड़ित के आसपास अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर रखी थी। एक मरीज के साथ दो से तीन जवान थे। ये किसी को भी मरीज के पास नहीं आने दे रहे थे।