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तनाव की बड़ी वजह है मैं ही सही हूं वाली सोच: प्रो बलराम पाणी
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-डीयू में मानसिक स्वास्थय और खुशी पर हुई चर्चा, बोले विशेषज्ञ तनाव कम करने के लिए खुद के लिए समय जरूरी
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में काम, पढ़ाई और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। छोटी-छोटी बातों पर खुद को ही सही मानने की सोच भी तनाव का एक बड़ा कारण बन रही है। लोगों में मौजूद मैं ही सही हूं की भावना मानसिक तनाव को बढ़ाती है। यह बात दिल्ली विश्वविद्यालय के डीन ऑफ कॉलेजेज प्रो. बलराम पाणी ने साइंस मीट्स सोशल साइंस: मेंटल वेल-बीइंग एंड हैप्पीनेस विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में कही।
डीयू के वाइस रीगल लॉज स्थित कन्वेंशन हॉल में रिसर्च, इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप काउंसिल (आरआईईसी) की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में प्रो. पाणी ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रखने के लिए लोगों में जागरूकता बढ़ाने के साथ इस विषय पर लगातार चर्चा करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सही जानकारी लोगों तक पहुंचनी चाहिए। इसके लिए विश्वविद्यालयों में ऐसे सम्मेलन और सेमिनार नियमित रूप से आयोजित किए जाने चाहिए।
साइंस मीट्स सोशल साइंस की अवधारणा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान प्रयोगों के माध्यम से चीजों को साबित करता है, जबकि सोशल साइंस अनुभवों के आधार पर उन्हें समझने का प्रयास करता है। दोनों क्षेत्रों के बीच संवाद से मानसिक स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
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डीयू के आरआईईसी के अध्यक्ष और सम्मेलन के संयोजक प्रो. दीनबंधु साहू ने कहा कि आज लोगों के पास सुविधाएं तो बहुत हैं, लेकिन अपने लिए समय नहीं है। पढ़ाई और काम का दबाव, चिंता, साथियों का दबाव और शोध से जुड़ी बढ़ती मांगों के बीच मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा बेहद जरूरी हो गई है।
सम्मेलन में डीयू के दक्षिणी परिसर की निदेशक प्रो. रजनी अब्बी विशिष्ट अतिथि के तौर पर मौजूद रहीं। कार्यक्रम में डीयू के कुलसचिव डॉ. विकास गुप्ता, डीन अकादमिक प्रो. के. रत्नाबली और सामाजिक विज्ञान संकाय की डीन प्रो. नीना पाण्डेय समेत कई अधिकारी मौजूद रहे। डीयू के विभिन्न कॉलेजों और विभागों के शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थियों के अलावा विभिन्न क्षेत्रों के शिक्षाविद, शोधकर्ता और विशेषज्ञ भी सम्मेलन में शामिल हुए।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में काम, पढ़ाई और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। छोटी-छोटी बातों पर खुद को ही सही मानने की सोच भी तनाव का एक बड़ा कारण बन रही है। लोगों में मौजूद मैं ही सही हूं की भावना मानसिक तनाव को बढ़ाती है। यह बात दिल्ली विश्वविद्यालय के डीन ऑफ कॉलेजेज प्रो. बलराम पाणी ने साइंस मीट्स सोशल साइंस: मेंटल वेल-बीइंग एंड हैप्पीनेस विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में कही।
डीयू के वाइस रीगल लॉज स्थित कन्वेंशन हॉल में रिसर्च, इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप काउंसिल (आरआईईसी) की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में प्रो. पाणी ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रखने के लिए लोगों में जागरूकता बढ़ाने के साथ इस विषय पर लगातार चर्चा करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सही जानकारी लोगों तक पहुंचनी चाहिए। इसके लिए विश्वविद्यालयों में ऐसे सम्मेलन और सेमिनार नियमित रूप से आयोजित किए जाने चाहिए।
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साइंस मीट्स सोशल साइंस की अवधारणा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान प्रयोगों के माध्यम से चीजों को साबित करता है, जबकि सोशल साइंस अनुभवों के आधार पर उन्हें समझने का प्रयास करता है। दोनों क्षेत्रों के बीच संवाद से मानसिक स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
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डीयू के आरआईईसी के अध्यक्ष और सम्मेलन के संयोजक प्रो. दीनबंधु साहू ने कहा कि आज लोगों के पास सुविधाएं तो बहुत हैं, लेकिन अपने लिए समय नहीं है। पढ़ाई और काम का दबाव, चिंता, साथियों का दबाव और शोध से जुड़ी बढ़ती मांगों के बीच मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा बेहद जरूरी हो गई है।
सम्मेलन में डीयू के दक्षिणी परिसर की निदेशक प्रो. रजनी अब्बी विशिष्ट अतिथि के तौर पर मौजूद रहीं। कार्यक्रम में डीयू के कुलसचिव डॉ. विकास गुप्ता, डीन अकादमिक प्रो. के. रत्नाबली और सामाजिक विज्ञान संकाय की डीन प्रो. नीना पाण्डेय समेत कई अधिकारी मौजूद रहे। डीयू के विभिन्न कॉलेजों और विभागों के शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थियों के अलावा विभिन्न क्षेत्रों के शिक्षाविद, शोधकर्ता और विशेषज्ञ भी सम्मेलन में शामिल हुए।