ऑपरेशन ब्लू स्टार की 34वीं बरसीं पर पढ़िए, बगावत बर्बरता ब्रिटेन और बवाल की वो खौफनाक कहानी जो आज भी सिहरन पैदा कर दे। ऑपरेशन ब्लू स्टार को जानने से पहले उन परिस्थतियों को जानना जरूरी है, जिसके कारण ये हालात पैदा हुए। पंजाब में हिंसा की शुरुआत 1978 में हुई थी। उसी समय सिख धर्म प्रचार संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरांवाले का नाम चर्चा में आया।
1981 के बाद जब पंजाब में हिंसक गतिविधियां बढ़ने लगीं तो भिंडरांवाले के खिलाफ लगातार हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगने लगे। पुलिस का कहना था कि उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। अप्रैल 1983 में पंजाब पुलिस के उपमहानिरीक्षक एएस अटवाल की दिन दिहाड़े हरमंदिर साहिब परिसर में गोलियां मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद पुलिस का मनोबल लगातार गिरता चला गया।
लोगों का नरसंहार होता देखकर इंदिरा गांधी सरकार ने पंजाब में दरबारा सिंह की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। इसके बाद पंजाब में स्थिति बिगड़ती चली गई। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार से तीन महीने पहले तक हिंसक घटनाओं में मरने वालों की संख्या 298 हो चुकी थी। वैसे ऑपरेशन ब्लू स्टार के हालात एक जून से ही बनने शुरू हो गए थे।
एक जून को स्वर्ण मंदिर परिसर और उसके बाहर तैनात केंद्र रिजर्व पुलिस फोर्स के बीच गोलीबारी हुई थी। स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारों से लैस संत जरनैल सिंह, कोर्ट मार्शल किए गए मेजर जनरल सुभेग सिंह और सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के लड़ाकों ने खासी मोर्चाबंदी कर रखी थी। तीन जून को गुरु अर्जुन देव के शहीदी दिवस पर हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में जमा थे।
उधर, तीन जून तक भारतीय सेना अमृतसर में प्रवेश कर गई थी और स्वर्ण मंदिर को घेर चुकी थी। शाम तक कर्फ्यू लगा दिया गया था। चार जून को सेना ने गोलीबारी शुरू कर दी, ताकि चरमपंथियों के हथियारों और असले का अंदाजा लगाया जा सके। शाम होते-होत इंदिरा गांधी ने सेना को स्वर्ण मंदिर परिसर में घुसने और ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू करने का आदेश दे दिया। जिसके बाद वहां परिसर में भीषण खून-खराबा हुआ।