नाबालिग खिलाड़ियों के शोषण का अड्डा बनी अकादमी का एक और काला सच
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26 महीने से नाबालिग खिलाड़ियों के शोषण का अड्डा बनी बैडमिंटन अकादमी की एसोसिएशन 33 साल से अवैध है। कमेटी के सचिव केसी श्रीवास्तव की शिकायत पर लखनऊ मंडल के डिप्टी रजिस्ट्रार फर्म्स, सोसायटीज़ एवं चिट्स के डिप्टी रजिस्ट्रार अजय गुप्ता की जांच में यह खुलासा हुआ है।
डिप्टी रजिस्ट्रार ने एसोसिएशन की वर्तमान प्रबंध समिति को अवैध करार देते हुए फिर से चुनाव कराने के आदेश दिए हैं।
एसोसिएशन का रजिस्ट्रेशन गोरखपुर मंडल के डिप्टी रजिस्ट्रार फर्म्स, सोसायटीज़ एवं चिट्स के यहां 1980 में हुआ था। वर्ष 2010 में गोरखपुर मंडल से एसोसिएशन के समस्त मूल अभिलेख लखनऊ मंडल भेज दिए गए।
एसोसिएशन के सचिव आगरा निवासी केसी श्रीवास्तव ने 18 अक्तूबर 2016 को डिप्टी रजिस्ट्रार से एसोसिएशन पर लोगों के अवैध कब्जे, वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताएं करने तथा गलत सूचनाएं देकर कमेटी का नवीनीकरण कराने के संबंध में शिकायत की थी।
मनमाने तरीके से कराए चुनाव, नहीं दी सूचना
गत तीन फरवरी को जारी हुई डिप्टी रजिस्ट्रार की जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि एसोसिएशन की कमेटी वर्ष 1983 से अवैध रूप से संचालित हो रही है। नियमावली के मुताबिक एसोसिएशन की प्रबंध समिति का चुनाव प्रत्येक तीन वर्ष में होना चाहिए लेकिन चुनाव नहीं कराए जा रहे थे।
डिप्टी रजिस्ट्रार अजय गुप्ता का कहना है कि प्रबंध समिति ने मनमाने तरीके से चुनाव कराए। डिप्टी रजिस्ट्रार को मिले दस्तावेजों के मुताबिक 19 जून 1988 को एसोसिएशन की वार्षिक आम सभा हुई जिसमें चार वर्ष के लिए प्रबंध समिति का चुनाव कर लिया गया।
नियमत: किसी भी संस्था, कमेटी अथवा सोसायटी को नियमावली में संशोधन की जानकारी डिप्टी रजिस्ट्रार को देनी होती है। बैडमिंटन एसोसिएशन की कमेटी ने तीन साल के बजाए चार साल के लिए प्रबंध समिति का चुनाव करा लिया और इसकी सूचना डिप्टी रजिस्ट्रार को नहीं दी।
वर्ष 1983 और वर्ष 1988 के बीच चुनाव से संबंधित पत्रावली भी डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय को उपलब्ध नहीं कराई गई।
नियमावली में चेयरमैन का पद ही नहीं
डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय में एसोसिएशन की रजिस्टर्ड नियमावली के मुताबिक प्रबंध समिति में एक अध्यक्ष, छह उपाध्यक्ष, एक सचिव, दो संयुक्त सचिव, एक कोषाध्यक्ष व 18 सदस्य सहित कुल 29 लोग रखे गए थे। वर्ष 1998 तक इस नियम का अनुपालन होता रहा।
डिप्टी रजिस्ट्रार का कहना है कि प्रबंध समिति में न केवल पदों को जोड़ा गया बल्कि सदस्यों की संख्या भी बढ़ा दी गई। वर्ष 2004-2005 से 2008-2009 तक की सूची में चेयरमैन का पद नहीं दर्शाया गया है। एसोसिएशन में बिना नियमावली के संशोधन कराए गए। प्रबंध समिति में सदस्यों की संख्या लगातार अवैध रूप से बढ़ाई जाती रही।
..तो पहली प्रबंध समिति ही वैध थी
एसोसिएशन की पहली प्रबंध समिति को ही वैध माना जा रहा है। पहली प्रबंध समिति का गठन 25 जुलाई 1980 को नियमावली के मुताबिक तीन साल के लिए हुआ था। इस प्रबंध समिति का कार्यकाल 25 जुलाई 1983 को समाप्त हो गया था। इसी दिन अगले कार्यकाल के लिए प्रबंध समिति का चुनाव हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया गया। डिप्टी रजिस्ट्रार का कहना है कि ऐसे हालातों में चुनाव कराने का अधिकार रजिस्ट्रार के हाथों में आ जाता है।
ये हैं अनसुलझे सवाल
1-अवैध एसोसिएशन के पदाधिकारी करते रहे शोषण, क्यों नहीं किसी ने की जांच
2-इसमें शहर के नामचीन ब्यूरोक्रेट व नेता हैं, इनकी नाक के नीचे कैसे चलता रहा गोरखधंधा
3-बैडमिंटन एसोसिएशन के चेयरमैन ने क्यों सिर्फ आंतरिक जांच कराई?
4-एक अवैध एसोसिएशन कैसे कराती रही बड़े-बड़े टूर्नामेंट
5-एसोसिएशन अवैध थी तो सरकार से कैसे मिलती रही करोड़ों की ग्रांट
अवैध एसोसिएशन ने सरकार से वसूली करोड़ों की ग्रांट
अगर डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय में रजिस्टर्ड एसोसिएशन की नियमावली के मुताबिक यूपी बैडमिंटन अकादमी का कोई अस्तित्व नहीं है तो आखिर यह एसोसिएशन किस आधार पर सालों से अब तक खेल विभाग और राज्य सरकार ने करोड़ों की ग्रांट वसूल रही है। आलम यह है कि एसोसिएशन की ओर से हर वर्ष होने वाली सैयद मोदी ग्रैंड प्रिक्स गोल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप के लिए पिछले तीन साल से एक करोड़ रुपये की स्पेशल ग्रांट भी मिल रही है।
एसोसिएशन की बात करें तो इसमें रसूखदारों की कोई कमी नही है। राजनेताओं से लेकर तमाम नौकरशाह समय-समय पर यूपी बैडमिंटन एसोसिएशन में अहम पदों पर रह चुके हैं। ऐसे में सरकार से स्पेशल ग्रांट हासिल करना एसोसिएशन के लिए कभी भी कोई मुश्किल काम नहीं रहा और मोदी बैडमिंटन के नाम पर हर साल एक करोड़ रुपये की अतिरिक्त धनराशि ली जाती रही।
अब यूपी बैडमिंटन अकादमी में यौन शोषण से लेकर गबन तक के खुलासे के बाद एसोसिएशन के चेयरमैन अखिलेश दास और सचिव डॉ. विजय सिन्हा के बीच रार बढ़ गई और दोनों ही ओर से बड़े और हैरतअंग्रेज खुलासे सामने आने लगे।
मजे की बात तो यह है कि बीती 12 फरवरी को यूपी बैडमिंटन एसोसिएशन बेटे निशांत सिन्हा के साथ निकाले जाने के बाद डॉ. विजय सिन्हा ने डिप्टी रजिस्ट्रार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए फैसला मानने से इन्कार कर दिया, जबकि वे खुद भी वर्ष 1990 से इस एसोसिएशन के महासचिव पद पर कार्यरत रहे हैं।
दी जाती हैं ये सुविधाएं
गौरतलब है कि खेल विभाग के नियमानुसार जो भी खेल एसोसिएशन विभाग से संबंद्ध होती है तो समन्वय की प्रतियोगिताओं, कैंप, खिलाड़ियों के आने जाने का खर्च, राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतनेे वाले खिलाड़ियों को प्रोत्साहन राशि जैसी तमाम सुविधाएं मिलती है।
मामले पर खेल निदेशक डॉ. आरपी सिंह का कहना है कि देखिए, खेल विभाग उन्हीं खेल एसोसिएशन को मान्यता देता है, जो संबंधित खेल की नेशनल बॉडी से जुड़ा हो। इसके अलावा एसोसिएशन को इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन और केंद्र सरकार से भी मान्यता हासिल होनी चाहिए। इस आधार पर यूपी बैडमिंटन एसोसिएशन सभी मानक को पूरा करता है। इसलिए उन्हें ग्रांट देने से हम पीछे नहीं हट सकते। जहां तक सैयद मोदी बैडमिंटन को एक करोड़ रुपय् की स्पेशल ग्रांट का सवाल है तो सैयद मोदी के नाम पर होने वाली यह प्रतियोगिता देश की सबसे बड़ी प्रतियोगिताओं में शुमार है। इसलिए सरकार की ओर से इस आयोजन को पिछले तीन साल से एक करोड़ की ग्रांट दी जा रही है।