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लवी में सिमटता जा रहा वाद्य यंत्रों का कारोबार
Updated Thu, 16 Nov 2017 03:32 PM IST
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वाद्य यंत्र
- फोटो : अमर उजाला
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रामपुर बुशहर। अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में इस बार भी वाद्य यंत्रों की दुकानें सज गई हैं, पर खरीदार दिख नहीं रहे। पहले लवी में वाद्य यंत्रों की काफी मांग रहती थी, वहीं आज इनकी खरीदारी कम हो गई है। इसका एक कारण यह भी है कि अब शादी आदि समारोहों के मौके पर डीजे का प्रचलन काफी बढ़ गया है। अब ये वाद्य यंत्र देवी देवताओं की पालकियों के साथ ही ज्यादा दिखाई देते हैं। इस बार पहाड़ी वाद्य यंत्रों के दाम भी ज्यादा हैं।
गांवों में आयोजित समारोहों में परंपरागत वाद्य यंत्र काफी कम दिखाई देते हैं। वर्तमान में वाद्य यंत्रों का कारोबार धीरे-धीरे सिमट रहा है। लवी मेले को शुरू हुए तीन दिन हो चुके हैं, लेकिन वाद्य यंत्रों को खरीदने वाले ग्राहकों का व्यापारी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। आधुनिक दौर में ढोल और नगाड़ों का सिमट कारोबार रहा है।
कुछ साल पहले मेले में वाद्य यंत्रों का अच्छा खासा कारोबार हुआ करता था। अब स्थिति बिल्कुल विपरीत है। इस बार भी वाद्य यंत्रों के व्यापारी निराश ही दिखाई दे रहे हैं। कड़ी मेहनत करके तैयार किए गए ढोल, नगाड़े, करनाल, समेत मूर्तियों की खरीदार नहीं मिल रहे। वाद्य यंत्रों के व्यापारियों में एनएस सोनी और शरण दास बताते हैं कि करीब पैंतीस साल तक वाद्य यंत्रों को हाथों-हाथ लेते थे। आज हालत पहले जैसे नहीं है। उन्होंने कहा कि आजकल शादियों और अन्य समारोहों में करनाल, नरसिंघे और ढोल नगाड़े की जगह डीजे और म्यूजिकल सिस्टम ने ले लिया है। वाद्य यंत्रों का कारोबार सिमटता जा रहा है।
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वाद्य यंत्रों के पिछले साल और अबके रेट
वाद्य यंत्र पिछले साल इस साल
ढोल 16 हजार 23000
नरसिंघा 13 हजार 16000
करनाल 13 हजार 15000
कसाल 5 से 15 हजार 11000
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गांवों में आयोजित समारोहों में परंपरागत वाद्य यंत्र काफी कम दिखाई देते हैं। वर्तमान में वाद्य यंत्रों का कारोबार धीरे-धीरे सिमट रहा है। लवी मेले को शुरू हुए तीन दिन हो चुके हैं, लेकिन वाद्य यंत्रों को खरीदने वाले ग्राहकों का व्यापारी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। आधुनिक दौर में ढोल और नगाड़ों का सिमट कारोबार रहा है।
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कुछ साल पहले मेले में वाद्य यंत्रों का अच्छा खासा कारोबार हुआ करता था। अब स्थिति बिल्कुल विपरीत है। इस बार भी वाद्य यंत्रों के व्यापारी निराश ही दिखाई दे रहे हैं। कड़ी मेहनत करके तैयार किए गए ढोल, नगाड़े, करनाल, समेत मूर्तियों की खरीदार नहीं मिल रहे। वाद्य यंत्रों के व्यापारियों में एनएस सोनी और शरण दास बताते हैं कि करीब पैंतीस साल तक वाद्य यंत्रों को हाथों-हाथ लेते थे। आज हालत पहले जैसे नहीं है। उन्होंने कहा कि आजकल शादियों और अन्य समारोहों में करनाल, नरसिंघे और ढोल नगाड़े की जगह डीजे और म्यूजिकल सिस्टम ने ले लिया है। वाद्य यंत्रों का कारोबार सिमटता जा रहा है।
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वाद्य यंत्रों के पिछले साल और अबके रेट
वाद्य यंत्र पिछले साल इस साल
ढोल 16 हजार 23000
नरसिंघा 13 हजार 16000
करनाल 13 हजार 15000
कसाल 5 से 15 हजार 11000