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Bilaspur News: भक्त ध्रुव की कथा सुनाकर श्रद्धालुओं को समझाया भक्ति का महत्व

Fri, 12 May 2023 06:12 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Fri, 12 May 2023 06:12 PM IST
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Explained the importance of devotion to the devotees by telling the story of devotee Dhruv
-कठोर तपस्या से अत्यंत ही अल्पकाल में भगवान नारायण को किया प्रसन्न
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। ग्राम पंचायत औहर द्वारा ठाकुरद्वारा मंदिर परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन प्रवचन करते हुए कथावाचक बृजेश गोस्वामी ने भक्त ध्रुव की कथा सुनाकर श्रद्धालुओं को भक्ति का महत्व समझाया।
उन्होंने कहा क उत्तानपाद की सुनीति पहली पत्नी थी, जिनके पुत्र ध्रुव थे। सुनीति बड़ी रानी थी, लेकिन राजा सुनीति के बजाय सुरुचि और उसके पुत्र को ज्यादा प्रेम करता था। उन्होंने कहा कि एक बार राजा अपने पुत्र ध्रुव को गोद में लेकर बैठे थे तभी वहां सुरुचि आ गई। अपनी सौतन के पुत्र ध्रुव को गोद में बैठा देखकर उसके मन में जलन होने लगी। तब उसने ध्रुव को गोद में से उतारकर अपने पुत्र को गोद में बैठाते हुए कहा कि राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है और राजसिंहासन का भी अधिकारी हो सकता है जो मेरे गर्भ से जन्मा हो। तू मेरे गर्भ से नहीं जन्मा है। यदि तेरी इच्छा राज सिंहासन प्राप्त करने की है तो भगवान नारायण का भजन कर। इसलिए उनकी कृपा से जब तू मेरे गर्भ से उत्पन्न होगा तभी सिंहासन प्राप्त कर पाएगा। बृजेश गोस्वामी ने बताया कि पांच साल का अबोध बालक ध्रुव सहमकर रोते हुए अपनी मां सुनीति के पास गया और उसने अपनी मां से उसके साथ हुए व्यवहार के बारे में कहा। मां ने कहा, बेटा ध्रुव मेरी सौतेली से तेरे पिता अधिक प्रेम करते हैं। इसी कारण वे हम दोनों से दूर हो गए हैं। अब हमें उनका सहारा नहीं रह गया।
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कहा कि हमारे सहारा तो जगतपति नारायण ही है। नारायण के अतिरिक्त अब हमारे दुख को दूर करने वाला कोई दूसरा नहीं बचा है। पांच साल के बालक के मन पर दोनों ही मां के व्यवहार का बहुत गहरा असर हुआ और वह एक दिन घर छोड़कर चला गया। रास्ते में उसे नारदजी मिले। नारद मुनि ने उससे कहा बेटा तुम घर जाओ तुम्हारे माता पिता चिंता करते होंगे, लेकिन ध्रुव नहीं माना और कहा कि मैं नारायण की भक्ति करने जा रहा हूं। तब नारद मुनि ने उसे ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र की दीक्षा दी। वह बालक यमुना नदी के तट पर मधुवन में इस मंत्र का जाप करने लगा। बालक की कठोर तपस्या से अत्यंत ही अल्पकाल में भगवान नारायण प्रसन्न हो गए और उन्होंने दर्शन देकर कहा हे बालक मैं तेरे अंतर्मन की व्यथा और इच्छा को जानता हूं। तेरी सभी इच्छापूर्ण होंगी और तुझे वह लोक प्रदान करता हूं, जिसके चारों ओर ज्योति चक्र घूमता रहता है और सूर्यादि सभी ग्रह और सप्तर्षि नक्षत्र जिसके चक्कर लगाते रहते हैं। प्रलय काल में भी इस लोक का नाश नहीं होगा। सभी प्रकार के सर्वोत्तम ऐश्वर्य भोगकर अंत समय में तू मुझे प्राप्त करेगा। कथा समापन पर प्रसाद वितरण भी किया गया।
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