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Bilaspur News: भगवान कृष्ण के गुरु रूप भजनों प झूमें भक्त
Sun, 21 Jul 2024 11:18 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Sun, 21 Jul 2024 11:18 PM IST
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बिलासपुर के बलोक गांव में आयोजित गुरु पूर्णिमा कार्यक्रम में मौजूद लोग। संवाद
शहर के लखनपुर वार्ड में धूमधाम से मनाया गुरु पूर्णिमा का त्योहार
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। शहर के लखनपुर वार्ड के साथ लगते बलोह गांव में रविवार को श्री गुरु पूर्णिमा का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। श्री राधा माधव निवास में आयोजित कार्यक्रम में सैंकड़ों लोगों ने भाग लिया। सुबह के समय श्री हरि संकीर्तण कार्यक्रम में महिलाओं ने भगवान श्री कृष्ण के गुरु रूप भजनों से खूब समां बांधा। इसके बाद श्री व्यास पूजन का आयोजन किया गया। इसमें पंडित सुरेश भारद्वाज ने गुरु का महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुरु को भगवान का स्थान दिया गया है। इसका सीधा अर्थ है कि गुरु भगवान के समान है। गुरु अपने शिष्यों के मन के अंधेरे को दूर करता है। गुरु शिष्य परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। सर्वप्रथम नारायण ने ब्रह्मा को ज्ञान दिया और ब्रह्मा ने नारद को इसे हस्तांतरित किया। लेकिन लंबे समय तक ज्ञान के वितरण की कला गति नहीं पकड़ पाई। क्योंकि गुरु तो ज्ञान देकर अपना कार्य पूर्ण करता है लेकिन सुनने वाला इसे कितना ग्रहण करता है और कितना भूल जाता है, उस जीव पर निर्भर करता है। फिर भगवान ने विचार किया कि ज्ञान को किस प्रकार गति दी जाए ताकि ज्ञान कठिन से कठिन समय समय तक याद रहे। फिर आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के मध्यान में नारायण व्यास के रूप में आए और उन्होंने ग्रंथ रूप में चार वेदों का अवतरण किया। जिसे आज ज्ञान का आधार मान कर सृष्टि को चलाया जा रहा है। कथा समापन पर विशाल भंडारे का आयोजन किया गया जिसमें सैंकड़ों लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। शहर के लखनपुर वार्ड के साथ लगते बलोह गांव में रविवार को श्री गुरु पूर्णिमा का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। श्री राधा माधव निवास में आयोजित कार्यक्रम में सैंकड़ों लोगों ने भाग लिया। सुबह के समय श्री हरि संकीर्तण कार्यक्रम में महिलाओं ने भगवान श्री कृष्ण के गुरु रूप भजनों से खूब समां बांधा। इसके बाद श्री व्यास पूजन का आयोजन किया गया। इसमें पंडित सुरेश भारद्वाज ने गुरु का महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुरु को भगवान का स्थान दिया गया है। इसका सीधा अर्थ है कि गुरु भगवान के समान है। गुरु अपने शिष्यों के मन के अंधेरे को दूर करता है। गुरु शिष्य परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। सर्वप्रथम नारायण ने ब्रह्मा को ज्ञान दिया और ब्रह्मा ने नारद को इसे हस्तांतरित किया। लेकिन लंबे समय तक ज्ञान के वितरण की कला गति नहीं पकड़ पाई। क्योंकि गुरु तो ज्ञान देकर अपना कार्य पूर्ण करता है लेकिन सुनने वाला इसे कितना ग्रहण करता है और कितना भूल जाता है, उस जीव पर निर्भर करता है। फिर भगवान ने विचार किया कि ज्ञान को किस प्रकार गति दी जाए ताकि ज्ञान कठिन से कठिन समय समय तक याद रहे। फिर आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के मध्यान में नारायण व्यास के रूप में आए और उन्होंने ग्रंथ रूप में चार वेदों का अवतरण किया। जिसे आज ज्ञान का आधार मान कर सृष्टि को चलाया जा रहा है। कथा समापन पर विशाल भंडारे का आयोजन किया गया जिसमें सैंकड़ों लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।