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एशिया कप टूर्नामेंट : पिता ने पान की रेहड़ी लगाकर बेटी मंजू का सपना किया पूरा
Tue, 13 Jun 2023 01:00 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
Updated Tue, 13 Jun 2023 01:00 AM IST
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फोटो 31- पान के खोखे पर मंजू चौरसिया के पिता वकील भगत।
-हॉकी खिलाड़ी मंजू चौरसिया ने भारतीय जूनियर महिला टीम में बखूबी निभाई डिफेंडर की भूमिका
संवाद न्यूज एजेंसी
सोनीपत। एशिया कप टूर्नामेंट में भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम के जीत में सोनीपत के ब्रह्म नगर निवासी मंजू चौरसिया ने भी शानदार भूमिका निभाई। टीम में डिफेंडर की भूमिका में मंजू चौरसिया ने शानदार खेल दिखाते हुए टीम को मजबूती दी। एशिया कप में खिताबी जीत के साथ ही लाडली के परिजन बेहद खुश हैं।
बधाई देने वालों का भी तांता लगा हुआ है। टीम की जीत पर परिजनों का कहना है कि लाडली ने गर्व से सीना चौड़ा कर दिया। बेटी के खेलने के शौक और हॉकी के प्रति जुनून ने उसे आज अलग पहचान दिलाई है।
सोनीपत की ब्रह्म कॉलोनी निवासी मंजू चौरसिया के पिता वकील भगत कहते हैं कि वह मूलरूप से बिहार के रहने वाले हैं। वह साल 1984 में सोनीपत आकर रहने लगे थे। वह पान का खोखा चलाकर अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। परिवार की आर्थिक स्थित ज्यादा अच्छी नहीं है। बेटी मंजू को बचपन से ही खेलने का बेहद शौक रहा है।
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साल 2006 में जब वह पांचवीं कक्षा में थी तब पहली बार हॉकी स्टीक थामी थी। उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हॉकी के प्रति उसका जुनून ऐसा था कि खाना तक छोड़ देती थी। यही नहीं बीमारी की हालत में भी मना करने के बावजूद हॉकी का अभ्यास करने के लिए मैदान पर जाती थी। उसके इसी जुनून ने आज उसे नई पहचान दिलाई है।
माता-पिता से ज्यादा कोच ने दिया साथ
वकील भगत बताते हैं कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के चलते उनसे जो बन पड़ा उन्होंने किया, लेकिन लाडली की इस उपलब्धि में सबसे बड़ा योगदान उनकी कोच प्रीतम सिवाच का है। प्रीतम सिवाच ने माता-पिता से ज्यादा साथ दिया है। वह हर परिस्थिति में उसके साथ खड़ी रहीं और उसे यहां तक पहुंचाया। लाडो को आज जो मुकाम मिला है वह कोच प्रीतम सिवाच के आशीर्वाद, उनके सिखाए गए गुर और योगदान का परिणाम है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
सोनीपत। एशिया कप टूर्नामेंट में भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम के जीत में सोनीपत के ब्रह्म नगर निवासी मंजू चौरसिया ने भी शानदार भूमिका निभाई। टीम में डिफेंडर की भूमिका में मंजू चौरसिया ने शानदार खेल दिखाते हुए टीम को मजबूती दी। एशिया कप में खिताबी जीत के साथ ही लाडली के परिजन बेहद खुश हैं।
बधाई देने वालों का भी तांता लगा हुआ है। टीम की जीत पर परिजनों का कहना है कि लाडली ने गर्व से सीना चौड़ा कर दिया। बेटी के खेलने के शौक और हॉकी के प्रति जुनून ने उसे आज अलग पहचान दिलाई है।
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सोनीपत की ब्रह्म कॉलोनी निवासी मंजू चौरसिया के पिता वकील भगत कहते हैं कि वह मूलरूप से बिहार के रहने वाले हैं। वह साल 1984 में सोनीपत आकर रहने लगे थे। वह पान का खोखा चलाकर अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। परिवार की आर्थिक स्थित ज्यादा अच्छी नहीं है। बेटी मंजू को बचपन से ही खेलने का बेहद शौक रहा है।
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साल 2006 में जब वह पांचवीं कक्षा में थी तब पहली बार हॉकी स्टीक थामी थी। उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हॉकी के प्रति उसका जुनून ऐसा था कि खाना तक छोड़ देती थी। यही नहीं बीमारी की हालत में भी मना करने के बावजूद हॉकी का अभ्यास करने के लिए मैदान पर जाती थी। उसके इसी जुनून ने आज उसे नई पहचान दिलाई है।
माता-पिता से ज्यादा कोच ने दिया साथ
वकील भगत बताते हैं कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के चलते उनसे जो बन पड़ा उन्होंने किया, लेकिन लाडली की इस उपलब्धि में सबसे बड़ा योगदान उनकी कोच प्रीतम सिवाच का है। प्रीतम सिवाच ने माता-पिता से ज्यादा साथ दिया है। वह हर परिस्थिति में उसके साथ खड़ी रहीं और उसे यहां तक पहुंचाया। लाडो को आज जो मुकाम मिला है वह कोच प्रीतम सिवाच के आशीर्वाद, उनके सिखाए गए गुर और योगदान का परिणाम है।