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कभी गुफा से शहर की बावड़ी में स्नान करने आती थीं रानियां व दासियां

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 27 Sep 2022 11:48 PM IST
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Sometimes the queens and maids used to come from the cave to take a bath in the well of the city.
रानियां चुंगी के समीप शहर की प्राचीन बावड़ी जिसमें बनी की गुफा। संवाद - फोटो : Sirsa
बलविंद्र स्वामी
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सिरसा। शहर कभी प्राचीन धरोहरों का प्रतीक रहा है, इसका प्रमाण यहां की प्राचीन पुस्तकों में मिला है। प्रशासनिक उदासीनता के कारण ये धरोहर उपेक्षा की शिकार हुई हैं। समय के अनुसार इन प्राचीन धरोहर को संजोया जाता तो आज शहर पर्यटन के रूप में जाना जाता।
इतिहासकारों के अनुसार यहां एक बावड़ी में बड़ी सुरंग थी, जो शहर से लेकर रानियां तक जाती थी। इनके किस्से कहानियों के रूप में किताबों में दर्ज हैं या फिर बुजुर्गों की जुबां से सुने जाते हैं। शहर का थेहड़ इस बात का साक्षी है जिसे अब पुरातत्व विभाग ने संरक्षण में लिया हुआ है। थेहड़ से कुछ दूरी पर रानियां चुंगी के समीप कभी विशाल बावड़ी थी, जिसमें बाकायदा एक गुफा दिखाई देती थी।
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इस बावड़ी में गुफा के जरिये रानियां क्षेत्र से शहर तक राजा की रानियां व दासियां स्नान करने के लिए आती थीं। प्रशासन ने इस गुफा का मार्ग ईंटों से बंद कर दिया गया था। इसके बाद वर्ष 1985 के करीब मिट्टी डालकर इस बावड़ी को ही जमींदोज कर दिया गया। इसके प्रमाण आज भी खुदाई करने पर मिल सकते हैं। वर्ष 1987 में यहां रेडक्रॉस कार्यालय बना दिया।
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एक नहीं यहां तो चार-चार बावड़ी थीं
थेहड़ मोहल्ला निवासी 75 वर्षीय बुजुर्ग रामप्रकाश उर्फ सतपाल ने बताया कि शहर में एक नहीं चार-चार बावड़ियां थीं, जो शहर की चारों दिशा में बनी हुई थी। मैं खुद 1976 में इस बावड़ी के समीप चाय बनाना शुरू किया। इस दौरान यहां बावड़ी व उसमें एक गुफा नजर आती थी। मन में भय होने की वजह से कभी अंदर जाने का प्रयास नहीं किया, लेकिन उस दौर में बुजुर्गों से सुना की इस गुफा का रास्ता रानियां तक जाता है। जो किसी जमाने में राजाओं की रानियां शहर से रानियां तक जाती थी। तभी तो रानियां शहर का नाम उन रानियों के नाम पर रखा गया था।

यहां के दुकानदार अरुण कुमार, बुजुर्ग कृष्ण कुमार व धर्मवीर ने बताया कि यहां बावड़ी व गुफा तो आज भी हमें याद आ रही है। यहां खेलने के लिए बच्चे आते थे और यहां स्थित कुएं का पानी लोग पीते थे। फायर ब्रिगेड के वाहनों में भी यहीं से पानी भरा जाता था। अगर समय रहते इसकी देखभाल की जाती और रेडक्रॉस का कार्यालय बनाए जाने के बजाय विकास होता तो आज की युवा पीढ़ी खुद अपनी आंखों से देखती कि हमारी संस्कृति व ऐतिहासिक धरोहर कैसी थी।

शहर में बस बावड़ी के नाम पर यह कुआं ही साक्ष्य बचा है। संवाद

शहर में बस बावड़ी के नाम पर यह कुआं ही साक्ष्य बचा है। संवाद- फोटो : Sirsa

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