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समाज में केवल नाम की ही समानता, घर के अहम मुद्दों पर बात हो तो महिलाओं को रसोई में भेज देते है...

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 26 Aug 2021 12:17 AM IST
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There is only equality in name in the society, if we talk about important issues of the house, we send women to the kitchen
संवाद में समानता की बात बताते हुए सीमा। - फोटो : Panipat
समाज में केवल नाम की ही समानता है, घर के अहम मुद्दों पर चर्चा के दौरान परिवार वाले महिलाओं को रसोई में भेज देते हैं। असमानता हमारे घर से ही शुरू होती है, जिसे हम सभी को मिलकर मिटाना होगा। महिला समानता दिवस पर अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से बुधवार को संभावना स्कूल में जिले की सामाजिक संस्था, अध्यापक व निजी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं से संवाद का आयोजन किया गया। संवाद में महिलाओं का मुख्य रूप से कहना है कि उन्हें अभी भी समाज में समानता नहीं मिली है। चाहे वह बाहर नौकरी करनी की बात हो या फिर अपनी बेटी को बाहर पढ़ाने की। महिलाओं का कहना है कि जिस समाज में लड़कियों के घर आने का समय देखा जाए और लड़कों को रात को 12 बजे आने पर भी कुछ नहीं बोला जाता हो, उस समाज में समानता कहां देखी जा सकती है।
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महिलाओं को रसोई में भेज दिया जाता है : सीमा रानी
घर के अहम मुद्दों की चर्चा जब भी किसी के घर में होती है तो हम बहु व बेटियों को तुरंत रसोई में जाने को बोल दिया जाता है। जबकि यदि वह हमारे सामने बात करें तो हम भी अपने परिवार की मद्द कर सकतीं हैं। हमें भी घर के मुद्दों के बारे में जानने का अधिकार होना चाहिए।
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-सीमा रानी, अध्यापिका
स्कूलों के वेतन में भी नहीं है समानता : सपना
स्कूलों में महिला व पुरुष के वेतन में भी समानता नहीं है। यदि स्कूल में किसी नए पुरुष अध्यापक को लगाया जाता है तो उसे 10 हजार से ऊपर सैलरी देते हैं। यदि उसकी जगह महिला अध्यापक को रखा जाता है तो उसे केवल 5 से 6 हजार रुपये दिए जाते हैं।
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- सपना देवी, अध्यापिका
घर की सोच अच्छी हो तो समान समझा जाता है : प्रवीन
यदि हमारे घर की सोच अच्छी हो तो महिला को भी हमेशा से ही समान समझा जाता है। मैं अपने घर पर अकेली कमाने वाली हूं। परिवार वाले कभी भी न तो समय पर पाबंदी लगाते हैं, न ही कभी मेरे से वेतन मांगते हैं। यदि घर से ही बदलाव किया जाए तो कुछ सालों में पूरा समाज बदला जा सकता है।
- प्रवीन रानी, अध्यापिका
सभी वर्ग की महिला को समान समझा जाना चाहिए : साइना
सरकारी दफ्तर में कोई साधारण कपड़े पहनकर चला जाता है तो उसकी बात सुनी ही नहीं जाती। वहीं यदि कोई गरीब महिला सरकारी स्कूल में भी चली जाती है तो पहले स्कूल अध्यापक उसे चार बात सुनाते हैं, उसके बाद उसे बाहर निकाल देते हैं। जो कि गलत है, सभी को समान समझा जाना चाहिए।
- साइना रानी, सदस्य, हुमाना संस्था
बेटियों को शादी से पहले व बाद में रोक टोक लगाई जाती है : गीता
हम बेटियों को शादी से पहले व शादी के बाद हमेशा रोक टोक लगाई जाती है। यदि कोई लड़की खेल में जाना चाहती है तो उसके खेलने पर रोक लगाई जाती है, क्योंकि उनको लगता है कि इसकी शादी में दिक्कत आएगी। वहीं शादी के बाद भी उस पर रोक लगाई जाती है कि अभी तुम्हें बाजार नहीं जाना है।
- गीता, सदस्य, हुमाना संस्था
पुलिस थाने में भी महिलाओं की सुनवाई नहीं होती : सोनिया
पुलिस थाने व पुलिस को बार बार फोन करने पर भी महिलाओं की सुनवाई नहीं होती। चाहे महिला हेल्पलाइन पर कॉल करें या सरकार के नए 112 नंबर पर। वहीं यदि हम थाने में चले जाती हैं तो घंटों तक पूछताछ करने के बाद हमें कार्रवाई करने का आश्वासन देकर भेज दिया जाता है और बाद में कुछ नहीं होता है।

- सोनिया, अध्यापिका
केवल नाम की समानता है : सुधा
समाज में केवल नाम की समानता है। यदि कोई महिला कहीं पर काम करती है तो उनके पति गेट पर इंतजार करते हैं कि वह सैलरी लेकर आती होगी। उनके आते ही सारी सैलरी ले लेते हैं। जिला प्रशासन को भी समय समय पर महिला अधिकारों के बारे में जागरूक करने के बारे में कार्यक्रम का आयोजन करना चाहिए।
- सुधा झा, मुख्य सलाहकार, बाल अधिकार सुरक्षा समिति
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