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Karnal News: बीमा कंपनी को ब्याज के साथ देना होगा लॉकडाउन में अस्पताल में रुकने का खर्च

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 24 Dec 2025 01:56 AM IST
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Insurance companies will have to pay the hospital stay expenses during the lockdown along with interest.
संवाद न्यूज एजेंसी
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करनाल। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, करनाल ने हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी अपोलो म्यूनिख (अब एचडीएफसी एर्गो) को फटकार लगाते हुए उपभोक्ता के इलाज पर खर्च हुई 4.56 लाख रुपये की राशि नौ प्रतिशत ब्याज सहित देने का आदेश दिया। इंश्योरेंस कंपनी को मानसिक पीड़ा व उत्पीड़न के लिए 25 हजार रुपये और मुकदमे पर आए खर्च के तौर पर 11 हजार रुपये अतिरिक्त देने होंगे। आयोग के अनुसार कंपनी ने स्वास्थ्य बीमा क्लेम को गलत तरीके से खारिज किया था।

शिकायतकर्ता सेक्टर-8 निवासी पारस भारद्वाज ने बताया कि उन्होंने अपोलो म्यूनिख (अब एचडीएफसी एर्गो) इंश्योरेंस कंपनी से स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली हुई थी। वर्ष 2020 में उन्हें फुटबाल खेलते समय घुटने में चोट लग गई थी। वह इलाज करवाने के लिए केरल के आर्य वैद्य शाला में आयुर्वेदिक उपचार करवाने चले गए। 15 मार्च 2020 को 21 दिनों के लिए गए थे। लॉकडाउन लगने के कारण मजबूरी में उन्हें 72 दिनों तक केरल में ही अस्पताल में रुकना पड़ा था। वहां से आने के बाद उन्होंने बीमा कंपनी के समक्ष अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए इलाज पर आए खर्च के क्लेम की फाइल जमा करवा दी। कंपनी ने इलाज के दौरान तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने का तर्क देते हुए उनका क्लेम खारिज कर दिया था। उन्होंने जिला उपभोक्ता निवारण विवाद आयोग के समक्ष अपना केस दायर किया।
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आयोग ने आदेश जारी करते हुए कहा कि कंपनी को उपभोक्ता के इलाज पर आए खर्च की 4 लाख 56 हजार 112 रुपये की राशि क्लेम खारिज होने की तारीख से भुगतान की तारीख तक नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ देनी होगी। इसके अलावा कंपनी को उपभोक्ता को हुई मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए 25 हजार रुपये का अतिरिक्त भुगतान करना होगा। मुकदमे पर आए खर्च के 11 हजार रुपये भी देने होंगे। उपभोक्ता आयोग ने इस आदेश के पालन के लिए 45 दिन का समय निर्धारित किया है। कंपनी को आदेश का पालन इस अवधि के बीच करना होगा।
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आयोग की टिप्पणी : कंपनी ने तकनीकी आधार पर जायज क्लेम रोका
दोनों पक्षों को सुनने के बाद आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्यों ने कहा कि कंपनी यह साबित करने में विफल रही कि शिकायतकर्ता ने अपने क्लेम के दौरान क्या झूठे तथ्य पेश किए हैं। आयोग ने फैसले में स्पष्ट किया कि लॉकडाउन की स्थिति हर व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर थी। तकनीकी आधार पर जायज क्लेम रोकना गलत है। कंपनी को ऐसा नहीं करना चाहिए था।
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