{"_id":"600209db8ebc3e328f3ae89b","slug":"hadppa-civiclion-karnal-news-knl576020113","type":"story","status":"publish","title_hn":"जल थल के रास्ते व्यापार भी करते थे हड़प्पाकालीन लोग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जल थल के रास्ते व्यापार भी करते थे हड़प्पाकालीन लोग
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सभी केंद्रों के ध्यानार्थ....
फोटो-300 से 310 नंबर तक
विश्व की करीब छह हजार साल पुरानी समृद्ध मानव हड़प्पा सभ्यता के करनाल जिले में 64 और केंद्रों की पहचान की गई है। इसकी पुष्टि पुरातत्ववेता एवं राजकीय महिला महाविद्यालय मतलौडा (पानीपत) के प्रोफेसर डा. विनय कुमार डांगी ने की है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘एन ऑर्कोलॉजिकल हिस्ट्री ऑफ हरियाणा’ में करनाल जिले में हड़प्पा संस्कृति से जुड़े इन 64 स्थानों का वर्णन किया है। यानी करनाल जिला छह हजार वर्ष पूर्व पूरी तरह से सटीक तरीके से बनी शैली पर आधारित स्थान था। इससे पहले इस सभ्यता के सिर्फ दो ही केंद्र चर्चा में थे।
दशकों तक अलग-अलग पुरातत्ववेताओं ने हड़प्पा के इन स्थानों की खोज की। पूरे हरियाणा में बिखरे हुए सभ्यता के प्रमाणों को डा. डांगी ने अपनी पुस्तक में संकलित किया है। 8 साल पहले इंग्लैंड की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रो. कैमरूप पेट्री व भारत के सुप्रसिद्ध बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आरएन सिंह करनाल के बोहला खालसा गांव स्थित प्राचीन टीले में उत्खनन कर यहां प्रौढ़ हड़प्पा के साक्ष्यों को प्रकाश में ला चुके हैं। इसके अलावा बहलोलपुर गांव में महर्षि पराशर तीर्थ स्थल के आसपास कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग ने हड़प्पा और महाभारत कालीन संस्कृति यहां होने की बात पुष्ट कर दी थी।
दो मानव संस्कृतियों के प्रमाण सहेजे है करनाल
बोहला खालसा में हड़प्पा कालीन व महाभारतकालीन दोनों संस्कृतियों के प्रमाण मिले हैं। यहां पुरास्थल के पास दृषद्वती नदी बहती थी, जिसका उल्लेख पुराणों में है। दृषद्वती की निशानियां आज भी विद्यमान हैं। विडंबना है कि विश्व के जाने-माने विश्वविद्यालयों द्वारा शोध कार्य करने के बाद भी सरकार, पुरातत्व विभाग व प्रशासन ने सभ्यता की धरोहर रूपी निशानियों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। अपितु स्थानीय लोगों ने पुरास्थल पर खनन भी किया है और खेती भी शुरू कर दी। यह पुरातात्विक धरोहर के हनन के साथ-साथ अतीत व वर्तमान के बीच संवाद को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। पुरातत्ववेता का कहना है कि इसका क्षेत्रफल करीब चार-पांच हेक्टेयर है। जबकि मौके पर अब यह पुरास्थल एक एकड़ में सिमट चुका है।
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कृषि और पशुपालन भी करते थे हड़प्पाकालीन लोग
प्रोफेसर डा. विनय कुमार डांगी ने कहा कि हरियाणा की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक हड़प्पा जो विश्व की प्राचीन सभ्यताओं मेनोपोटामिया (वर्तमान इराक) व मिश्र की समकालीन थी। जो व्यापारिक संबंध रखती थी। ये लोग जल व थल दोनों रास्ते से व्यापार करते थे। चावल, गेहूं, जौ, सरसों व लहसुन इत्यादि की खेती करते थे। सूर्य पूजा, नाग पूजा, मातृदेवी पूजा, स्वास्तिक पूजा व पशुपति पूजा करते थे। जो आज भी सनातन धर्म में प्रचलित है। इस संस्कृति के निर्माता कृषि व पशुपालन दोनों करते थे, जिसका पता हमें धान की खेती के साक्ष्यों से चलता है। करनाल में इन 64 केंद्रों पर हड़प्पाकालीन मिट्टी के बर्तन, खिलौने, मनके इत्यादि साक्ष्यों के आधार पर पुरातत्ववेता हड़प्पा के विभिन्न चरणों पर प्रकाश डालते हैं।
अब तक खोजे गए हड़प्पा के ये केंद्र
गगसीना, सौंखेड़ा, सानूखेड़ा, शीशपुर, हमालपुर, राजपुर रोड़ान, सिंघा, औंगद, बला-1, बोहला खालसा, बला-2, बला-3, बरसल, भस्मारा, बिचपरी, बीजना, बुढ़नपुर, बुद्धकेरनानिप, बुटाना, डाचर, दरड़, गीतापुर, हमालपुर, हरतारप, जलमाना-1, जलमाना-2, जठेड़ी-2, झंझाड़ी, झंझाड़ी-2, काछवा-1, काछवा-2, कारसा, ख्वाजा अहमदपुर, खाजा मानसिंह, माजरा रोड़ान, मनक माजरा, मनक माजरा-2, मोड़ी-2, मोड़ी-3, मोहड़ा, नरूखेड़ी, नारायणा, निड़ाना, निसिंग-2, पधाना, फपरान, पिलनी, पूजम, कबूलपुर, कबूलपुर-2, रायसन-2, राजपुर रोड़ान, रंबा-1, रंबा-2, सगा, सांभी, सांभी-1, संडीर, सौंकड़ा-1, सौंकड़ा-2, सौंकड़ा-3, शाकपुर मंचूरी, शीशपुर, सिंघा, तखाना खालसा, थिराना, उपलाना-2 सैयांवाला डेरा, उपलाना-3, उपलाना-4, रत्तक, मूंढ-1, मूंढ-2 शामिल हैं।
ऐसे तो मिट जाएंगे हड़प्पाकालीन संस्कृति के निशां
अभी तक चर्चा में रहे हड़प्पा सभ्यता के दो केंद्रों में से बोहला खालसा गांव स्थित हड़प्पा संस्कृति पुरास्थल के टीले से इतिहास की महत्वपूर्ण निशानियां लगातार गायब होती जा रही हैं। इस टीले का विस्तार चार से पांच एकड़ में बताया जाता था जिसका दायरा सिमटकर एक एकड़ में रह गया है। पिछले आठ साल में ही टीले से अवैध खनन किया गया। जिस कारण प्राचीन हड़प्पा की बहुत सी निशानियां यहां से मिट्टी के साथ चली गई। ऊंचा टीला अब गहरी खाईयों में तबदील होने लगा है। खनन माफिया को इसकी अहमियत का नहीं पता। पुरातत्व विभाग, जिला प्रशासन व ग्राम पंचायत ने भी इसकी सुरक्षा की तरफ ध्यान नहीं दिया। इसकी सुरक्षा के लिए तारबंदी नहीं की गई। मृदभांड, ईंटें, जानवरों की हड्डियों के अवशेष, चित्रित धूसर मृदभांड इत्यादि अवशेष यहां बड़ी मात्रा में टीले की मिट्टी में दिखाई देते हैं। मृदभांड ऐसा प्रमाण है जो पुरातत्ववेता के लिए किसी सभ्यता को जानने की वर्णमाला है। यदि अब भी सरकार ने इस टीले की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया तो शायद कुछ समय में ही इसका नामोनिशां मिट जाएगा। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय व कैंब्रिज विश्वविद्यालय की जांच में उत्खनन के दौरान यहां अनाज भंडारण के साक्ष्य भी मिले थे। खनन विभाग ने भी इस स्थान की अनदेखी की और अवैध खनन पर रोक नहीं लगाई।
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फोटो-300 से 310 नंबर तक
विश्व की करीब छह हजार साल पुरानी समृद्ध मानव हड़प्पा सभ्यता के करनाल जिले में 64 और केंद्रों की पहचान की गई है। इसकी पुष्टि पुरातत्ववेता एवं राजकीय महिला महाविद्यालय मतलौडा (पानीपत) के प्रोफेसर डा. विनय कुमार डांगी ने की है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘एन ऑर्कोलॉजिकल हिस्ट्री ऑफ हरियाणा’ में करनाल जिले में हड़प्पा संस्कृति से जुड़े इन 64 स्थानों का वर्णन किया है। यानी करनाल जिला छह हजार वर्ष पूर्व पूरी तरह से सटीक तरीके से बनी शैली पर आधारित स्थान था। इससे पहले इस सभ्यता के सिर्फ दो ही केंद्र चर्चा में थे।
दशकों तक अलग-अलग पुरातत्ववेताओं ने हड़प्पा के इन स्थानों की खोज की। पूरे हरियाणा में बिखरे हुए सभ्यता के प्रमाणों को डा. डांगी ने अपनी पुस्तक में संकलित किया है। 8 साल पहले इंग्लैंड की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रो. कैमरूप पेट्री व भारत के सुप्रसिद्ध बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आरएन सिंह करनाल के बोहला खालसा गांव स्थित प्राचीन टीले में उत्खनन कर यहां प्रौढ़ हड़प्पा के साक्ष्यों को प्रकाश में ला चुके हैं। इसके अलावा बहलोलपुर गांव में महर्षि पराशर तीर्थ स्थल के आसपास कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग ने हड़प्पा और महाभारत कालीन संस्कृति यहां होने की बात पुष्ट कर दी थी।
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दो मानव संस्कृतियों के प्रमाण सहेजे है करनाल
बोहला खालसा में हड़प्पा कालीन व महाभारतकालीन दोनों संस्कृतियों के प्रमाण मिले हैं। यहां पुरास्थल के पास दृषद्वती नदी बहती थी, जिसका उल्लेख पुराणों में है। दृषद्वती की निशानियां आज भी विद्यमान हैं। विडंबना है कि विश्व के जाने-माने विश्वविद्यालयों द्वारा शोध कार्य करने के बाद भी सरकार, पुरातत्व विभाग व प्रशासन ने सभ्यता की धरोहर रूपी निशानियों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। अपितु स्थानीय लोगों ने पुरास्थल पर खनन भी किया है और खेती भी शुरू कर दी। यह पुरातात्विक धरोहर के हनन के साथ-साथ अतीत व वर्तमान के बीच संवाद को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। पुरातत्ववेता का कहना है कि इसका क्षेत्रफल करीब चार-पांच हेक्टेयर है। जबकि मौके पर अब यह पुरास्थल एक एकड़ में सिमट चुका है।
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कृषि और पशुपालन भी करते थे हड़प्पाकालीन लोग
प्रोफेसर डा. विनय कुमार डांगी ने कहा कि हरियाणा की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक हड़प्पा जो विश्व की प्राचीन सभ्यताओं मेनोपोटामिया (वर्तमान इराक) व मिश्र की समकालीन थी। जो व्यापारिक संबंध रखती थी। ये लोग जल व थल दोनों रास्ते से व्यापार करते थे। चावल, गेहूं, जौ, सरसों व लहसुन इत्यादि की खेती करते थे। सूर्य पूजा, नाग पूजा, मातृदेवी पूजा, स्वास्तिक पूजा व पशुपति पूजा करते थे। जो आज भी सनातन धर्म में प्रचलित है। इस संस्कृति के निर्माता कृषि व पशुपालन दोनों करते थे, जिसका पता हमें धान की खेती के साक्ष्यों से चलता है। करनाल में इन 64 केंद्रों पर हड़प्पाकालीन मिट्टी के बर्तन, खिलौने, मनके इत्यादि साक्ष्यों के आधार पर पुरातत्ववेता हड़प्पा के विभिन्न चरणों पर प्रकाश डालते हैं।
अब तक खोजे गए हड़प्पा के ये केंद्र
गगसीना, सौंखेड़ा, सानूखेड़ा, शीशपुर, हमालपुर, राजपुर रोड़ान, सिंघा, औंगद, बला-1, बोहला खालसा, बला-2, बला-3, बरसल, भस्मारा, बिचपरी, बीजना, बुढ़नपुर, बुद्धकेरनानिप, बुटाना, डाचर, दरड़, गीतापुर, हमालपुर, हरतारप, जलमाना-1, जलमाना-2, जठेड़ी-2, झंझाड़ी, झंझाड़ी-2, काछवा-1, काछवा-2, कारसा, ख्वाजा अहमदपुर, खाजा मानसिंह, माजरा रोड़ान, मनक माजरा, मनक माजरा-2, मोड़ी-2, मोड़ी-3, मोहड़ा, नरूखेड़ी, नारायणा, निड़ाना, निसिंग-2, पधाना, फपरान, पिलनी, पूजम, कबूलपुर, कबूलपुर-2, रायसन-2, राजपुर रोड़ान, रंबा-1, रंबा-2, सगा, सांभी, सांभी-1, संडीर, सौंकड़ा-1, सौंकड़ा-2, सौंकड़ा-3, शाकपुर मंचूरी, शीशपुर, सिंघा, तखाना खालसा, थिराना, उपलाना-2 सैयांवाला डेरा, उपलाना-3, उपलाना-4, रत्तक, मूंढ-1, मूंढ-2 शामिल हैं।
ऐसे तो मिट जाएंगे हड़प्पाकालीन संस्कृति के निशां
अभी तक चर्चा में रहे हड़प्पा सभ्यता के दो केंद्रों में से बोहला खालसा गांव स्थित हड़प्पा संस्कृति पुरास्थल के टीले से इतिहास की महत्वपूर्ण निशानियां लगातार गायब होती जा रही हैं। इस टीले का विस्तार चार से पांच एकड़ में बताया जाता था जिसका दायरा सिमटकर एक एकड़ में रह गया है। पिछले आठ साल में ही टीले से अवैध खनन किया गया। जिस कारण प्राचीन हड़प्पा की बहुत सी निशानियां यहां से मिट्टी के साथ चली गई। ऊंचा टीला अब गहरी खाईयों में तबदील होने लगा है। खनन माफिया को इसकी अहमियत का नहीं पता। पुरातत्व विभाग, जिला प्रशासन व ग्राम पंचायत ने भी इसकी सुरक्षा की तरफ ध्यान नहीं दिया। इसकी सुरक्षा के लिए तारबंदी नहीं की गई। मृदभांड, ईंटें, जानवरों की हड्डियों के अवशेष, चित्रित धूसर मृदभांड इत्यादि अवशेष यहां बड़ी मात्रा में टीले की मिट्टी में दिखाई देते हैं। मृदभांड ऐसा प्रमाण है जो पुरातत्ववेता के लिए किसी सभ्यता को जानने की वर्णमाला है। यदि अब भी सरकार ने इस टीले की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया तो शायद कुछ समय में ही इसका नामोनिशां मिट जाएगा। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय व कैंब्रिज विश्वविद्यालय की जांच में उत्खनन के दौरान यहां अनाज भंडारण के साक्ष्य भी मिले थे। खनन विभाग ने भी इस स्थान की अनदेखी की और अवैध खनन पर रोक नहीं लगाई।